दलित वोट बैंक बहस: चुप्पी क्यों तनी है नीतीश, चिराग और मांझी की?
कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया ने उठाए सवाल, कहा- दलित वोटों पर निर्भर नेता न्यायाधीश पर हमले पर क्यों खामोश?

पटना : बिहार की सियासत में दलित वोट बैंक पर निर्भर नेता मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और जीतन राम मांझी को लेकर चर्चाएं तेज हैं। कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया ने बुधवार को इन नेताओं की चुप्पी पर हैरानी जताई कि जब देश के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई पर जूता फेकने का प्रयास हुआ, तो ये बड़े नेता क्यों खामोश हैं?
पुनिया ने कहा कि चुप्पी अकल्पनीय है क्योंकि ये नेता अपनी राजनीतिक ताकत दलित मतदाताओं पर टिका कर सत्ता में बने हैं। उन्होंने इस घटना को भाजपा और आरएसएस की जातिवादी सोच से जोड़ा और इसे न्यायाधीश के प्रति असम्मान बताया। उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव को ‘जूते और कलम’ के बीच की लड़ाई करार दिया, जहां कलम से दलित प्रतीक डॉ. भीमराव आंबेडकर की याद दिलाई।
पुनिया ने बिहार की दलित स्थिति पर चिंता जताई और कहा कि राज्य में करीब 19.15 लाख दलित परिवार कृषि पर निर्भर हैं और उनकी आय भी बहुत कम है। उनका कहना है कि राजग सरकार ने दलितों को वोट बैंक बनाया है लेकिन सच्चे अधिकार देने में विफल रही है। उन्होंने केंद्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण को सामाजिक न्याय की रीढ़ तोड़ने वाला फैसला बताया।
सांसद तनुज पुनिया ने राहुल गांधी की जमकर तारीफ करते हुए कहा कि वह सच में दलितों और वंचितों के हक के लिए लड़ रहे हैं, और राहुल गांधी ‘जूते’ के खिलाफ ‘कलम’ थामे हुए हैं।
राजनीतिक दबाव की बात करे तो चिराग पासवान और मांझी एनडीए में सीट बंटवारे को लेकर अड़े हुए हैं। चिराग अपनी पार्टी के लिए 25-30 सीटें चाहते हैं, जबकि मांझी ने 15 सीटों से कम देने से मना किया है। यह सीटों का बंटवारा गठबंधन की एकजुटता बनाये रखने में बड़ी चुनौती है।
नीतीश कुमार पिछड़ों के वोट पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जबकि चिराग और मांझी दलित वोट बैंक का प्रतिनिधित्व करते हैं। आगामी चुनाव बिहार की राजनीति में जातिगत समीकरण, दलित राजनीति और गठबंधन की रणनीतियों की अहम भूमिका निभाएगा।
इस बार चुनाव में दलित वोट बैंक के साथ-साथ सामाजिक न्याय और विकास का मुद्दा भी छाएगा, जो बिहार के भविष्य के लिए निर्णायक साबित होगा।




