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बागमती की लहरों से जूझकर 20 जिंदगियां बचाईं, खुद अमर हो गए पिंटू सहनी

गायघाट नाव हादसे में अदम्य साहस की मिसाल बने पिंटू सहनी को मरणोपरांत मिलेगा ‘जीवन रक्षक पदक’, परिजनों को सौंपा जाएगा सम्मान

मुजफ्फरपुर : 4 सितंबर 2023 का दिन मुजफ्फरपुर के गायघाट क्षेत्र के लिए कभी न भूलने वाला बन गया। बागमती नदी की उफनती धाराओं के बीच मधुरपट्टी और बभनगामा के पास एक नाव अचानक हादसे का शिकार हो गई। नाव में सवार स्कूली बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग पलभर में मौत से आंखों-आंखों में आ गए। उसी वक्त एक नाम इतिहास में दर्ज हो गया—पिंटू सहनी।

पिंटू सहनी।

जान की परवाह किए बिना पिंटू सहनी नदी की तेज धारा में कूद पड़े। एक-एक कर उन्होंने डूब रहे लोगों को बाहर निकालना शुरू किया। जब तक सांसों में दम था, वे दूसरों को जीवन देते रहे। उनके साहस और त्वरित निर्णय से 20 लोगों की जान बच गई, लेकिन इसी बचाव कार्य के दौरान पिंटू सहनी खुद बागमती में समा गए।

अब उनके इसी अद्वितीय साहस और बलिदान को राष्ट्र ने नमन किया है। केंद्र सरकार ने पिंटू सहनी को मरणोपरांत ‘जीवन रक्षक पदक’ से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। इस संबंध में सरकार के संयुक्त सचिव ने जिलाधिकारी सुब्रत कुमार सेन को पत्र भेजा है। पत्र में गृह मंत्रालय के अवर सचिव के संदर्भ का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि एक औपचारिक समारोह आयोजित कर यह प्रतिष्ठित पुरस्कार पिंटू सहनी के परिजनों को सौंपा जाएगा।

जिला प्रशासन जल्द ही सम्मान समारोह की तिथि तय करेगा, ताकि इस वीर सपूत के बलिदान को राष्ट्र स्तर पर उचित सम्मान मिल सके और उनके परिजनों को संबल प्रदान किया जा सके।

हादसे के वक्त जिस नाव पर 20 लोग सवार थे, उनमें अधिकांश 10वीं कक्षा के छात्र-छात्राएं थे। मधुरपट्टी गांव में हाई स्कूल नहीं होने के कारण बच्चों को बागमती नदी पार कर भटगामा होते हुए बेलौर यूएचएस स्कूल जाना पड़ता है। हादसे वाले दिन भी सभी छात्र-छात्राएं 10वीं का फॉर्म भरने के लिए घर से निकले थे।

नाव पर सिर्फ स्कूली बच्चे ही नहीं, बल्कि राशन लेने जा रहे कई ग्रामीण भी मौजूद थे। नाविक हरि किशोर सहनी रस्सी के सहारे नाव को नदी में खींचकर ले जा रहे थे। जैसे ही नाव भटगामा घाट के पास पहुंची, वह जोर से घाट से टकरा गई। झटके से रस्सी टूट गई और नाव अनियंत्रित होकर पलट गई। इसके बाद नाव में सवार बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग डूबने लगे। इसी अफरा-तफरी के बीच पिंटू सहनी देवदूत बनकर सामने आए और 20 लोगों को नया जीवन दिया।

आज पिंटू सहनी भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका साहस, उनका त्याग और उनका नाम बागमती की लहरों से भी ऊंचा हो चुका है।

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