PATNA: बाढ़ के कहर ने सिर्फ लोगों का घर-बार ही नहीं छीना, बल्कि अंतिम संस्कार जैसी मूल मानवीय गरिमा को भी लोगों की पहुंच से दूर कर दिया। दिलदारपुर निवासी 60 वर्षीय फुदो महतो की मौत राहत शिविर में हो गई। वे बीमार थे और बाढ़ के कारण अपना घर छोड़कर विश्वविद्यालय बाल निकेतन राहत शिविर में शरण लिए हुए थे।
सबसे दुखद पहलू यह था कि उनके परिवार के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वे अपने पिता का अंतिम संस्कार श्मशान घाट पर कर सकें। श्मशान घाट के शुल्क और अन्य खर्चे उनके बस में नहीं थे। मजबूरी में परिजनों ने गांव वालों की मदद से एक नाव किराए पर ली, उसी पर शव रखा, और भूतनाथ मंदिर से आगे, दियारा के एक ऊंचे टीले पर अंतिम संस्कार किया।
उनका मंझला बेटा भारी मन से पिता को मुखाग्नि देता रहा, और आसपास खड़े लोग बस यह सोचते रह गए कि गरीबी और आपदा किस हद तक इंसान को बेबस कर सकती है। फुदो महतो की यह आखिरी यात्रा हर किसी की आंखों को नम कर गई, और मानवता से जुड़े कई सवाल छोड़ गई।
यह घटना न सिर्फ प्राकृतिक आपदा की मार, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता का दुःखद सच भी उजागर करती है—जब सम्मान के साथ विदाई भी एक चुनौती बन जाए।



