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आपातकाल की 50वीं बरसी पर गरमाई छत्तीसगढ़ की सियासत, BJP-कांग्रेस में छिड़ी सियासी जंग

 

आज से ठीक 50 साल पहले यानी 25 जून 1975 को देश के लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसा वक्त आया जिसे आज भी “काला दिवस” के तौर पर याद किया जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सत्ता बचाने की कोशिश में संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल लागू कर दिया था। अब उस ऐतिहासिक घटना की 50वीं बरसी पर देशभर में राजनीतिक तापमान एक बार फिर चढ़ गया है। खासकर छत्तीसगढ़ में बीजेपी और कांग्रेस के बीच इस मुद्दे पर तीखा टकराव देखने को मिल रहा है।

 

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BJP ने मनाया ‘संविधान हत्या दिवस’

छत्तीसगढ़ बीजेपी इस दिन को “संविधान हत्या दिवस” के रूप में मना रही है। प्रदेशभर में प्रदर्शन और जन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस और इंदिरा गांधी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा,

“25 जून 1975 लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय है। बिना कैबिनेट की मंजूरी के इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति से आदेश जारी कर आपातकाल थोपा। उस दौरान 253 पत्रकार जेल में डाले गए, 1 लाख से ज्यादा लोगों को बंद किया गया, जिनमें 25 हजार मीसा और 75 हजार डीआईएसआईआर में थे।”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उस समय कांग्रेस ने लोकतंत्र के चारों स्तंभ – विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया – पर कब्जा जमाने की कोशिश की।

“आज की युवा पीढ़ी को जानना चाहिए कि किस तरह कांग्रेस ने लोकतंत्र की हत्या की,” – अरुण साव, उप मुख्यमंत्री


कांग्रेस का पलटवार: ‘अब भी अघोषित आपातकाल जारी’

बीजेपी के इन आरोपों पर कांग्रेस ने पलटवार करते हुए मौजूदा केंद्र सरकार को घेरा। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि आज भारत में “अघोषित आपातकाल” चल रहा है।

“इंदिरा गांधी का आपातकाल संविधान सम्मत था, लेकिन आज जो माहौल है वह लोकतंत्र के लिए ज्यादा खतरनाक है। सरकार खुद कहती है कि उसे संविधान बदलने के लिए 400 सीटें चाहिए थीं। यह स्पष्ट करता है कि बीजेपी संविधान विरोधी सोच के साथ काम कर रही है।”
भूपेश बघेल, पूर्व मुख्यमंत्री

भूपेश बघेल ने केंद्र सरकार पर जांच एजेंसियों के दुरुपयोग, विपक्ष की आवाज दबाने और संस्थानों पर नियंत्रण का आरोप लगाया।


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इतिहास की पुनरावृत्ति या राजनीतिक हथियार?

आपातकाल के 21 महीने (25 जून 1975 से 21 मार्च 1977) भारतीय लोकतंत्र के लिए एक कड़वा अनुभव रहे। प्रेस की आज़ादी छिनी, नागरिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया और विपक्ष के नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया। बीजेपी बार-बार इस घटना को कांग्रेस के “लोकतंत्र विरोधी” चरित्र के रूप में जनता के सामने रखती रही है।

वहीं, कांग्रेस ने इस बार इसे चुनावी राजनीति का हिस्सा बताते हुए कहा कि बीजेपी केवल आपातकाल के नाम पर पुरानी घटनाओं को उछालकर असली मुद्दों—बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की समस्याओं—से जनता का ध्यान भटकाना चाहती है।


राजनीतिक विश्लेषण

छत्तीसगढ़ में भले ही बीजेपी सत्ता में है, लेकिन कांग्रेस अब भी एक मजबूत विपक्ष के रूप में खड़ी है। आपातकाल की बरसी पर कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में नजर आ रही है, जबकि बीजेपी इस मुद्दे को आक्रामक रूप से भुनाने में लगी है।

भविष्य की राजनीति में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इतिहास का यह काला अध्याय आज की राजनीति को कोई नया मोड़ देगा या फिर यह सिर्फ बयानबाज़ी तक ही सीमित रह जाएगा।

 

 

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