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छठ महापर्व को यूनेस्को की विरासत सूची में जगह दिलाने की मुहिम

मोदी सरकार की पहल से बिहार में खुशी की लहर, संगीत नाटक अकादमी को सौंपी नामांकन की जिम्मेदारी, छठी मैया फाउंडेशन की मेहनत लाई रंग

PATNA: लोक आस्था का महान पर्व छठ अब वैश्विक मंच पर अपनी सांस्कृतिक चमक बिखेरने को तैयार है. केंद्र की मोदी सरकार ने छठ पूजा को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) सूची में शामिल करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है. इस खबर ने बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के मिथिला क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ा दी है. छठी मैया फाउंडेशन के पांच साल के अथक प्रयास और केंद्र सरकार की त्वरित पहल ने इस सांस्कृतिक धरोहर को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है.पटना से प्राप्त जानकारी के अनुसार, संस्कृति मंत्रालय ने संगीत नाटक अकादमी (SNA) को छठ महापर्व को यूनेस्को की प्रतिनिधि सूची में शामिल करने के लिए नामांकन की जांच और प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है. यह पहल छठी मैया फाउंडेशन के अध्यक्ष संदीप कुमार दुबे द्वारा 7 जुलाई 2025 को प्रस्तुत प्रस्ताव के बाद शुरू हुई. मंत्रालय ने 8 अगस्त 2025 को SNA को पत्र लिखकर इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने को कहा, जिसमें उल्लेख किया गया, “छठी मैया फाउंडेशन के अध्यक्ष संदीप कुमार दुबे द्वारा 24 जुलाई 2025 को छठ महापर्व को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल करने का प्रस्ताव प्राप्त हुआ है.”छठ पूजा, जो बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के मिथिला क्षेत्र में गहरी सांस्कृतिक जड़ों के साथ मनाई जाती है, वर्ष में दो बार आयोजित होती है. यह चार दिवसीय पर्व सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है, जिसमें शुद्धिकरण, कृतज्ञता और अटूट भक्ति के अनुष्ठान शामिल हैं. पहले दिन ‘नहाय-खाय’ में श्रद्धालु पवित्र नदियों या तालाबों में स्नान कर सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं. दूसरे दिन ‘खरना’ में दिनभर उपवास के बाद सूर्यास्त पर व्रत तोड़ा जाता है. तीसरे और चौथे दिन, ‘संध्या अर्घ्य’ और ‘उषा अर्घ्य’ में नदियों में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इस दौरान छठ के लोकगीत और 36 घंटे का निर्जला उपवास इस पर्व को और अधिक खास बनाते हैं.

क्यों खास है यह पहल?
वैश्विक पहचान: यूनेस्को की मान्यता से छठ पूजा को वैश्विक स्तर पर सम्मान मिलेगा, जैसा कि 2021 में कोलकाता की दुर्गा पूजा को प्राप्त हुआ था.
प्रवासियों के लिए सहूलियत: विदेशों में छठ पूजा के लिए विशेष अनुमति की आवश्यकता होती है, जो यूनेस्को की मान्यता के बाद आसान हो सकती है.
सांस्कृतिक संरक्षण: यह कदम छठ के लोकगीत, अनुष्ठानों और परंपराओं को संरक्षित करने में मदद करेगा, जो नई पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण है.

बिहार में उत्साह की लहर
इस खबर से बिहार के लोग उत्साहित हैं. पटना की रिमझिम मोदी, जो अब अमेरिका के मिशिगन में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं, कहती हैं, “मैं पिछले कुछ सालों से विदेश में छठ मना रही हूं. यह मान्यता हमारी संस्कृति को और मजबूत करेगी.” बिहार फाउंडेशन, जो अमेरिका में बिहारी प्रवासियों की मदद करता है, ने भी इस पहल का स्वागत किया है. मुजफ्फरपुर के पर्यावरणविद् सुरेश गुप्ता, जो लीचीपुरम अभियान से जुड़े हैं, कहते हैं, “छठ और शाही लीची बिहार की सांस्कृतिक पहचान हैं. यूनेस्को की मान्यता इसे विश्व मंच पर ले जाएगी.”

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