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सुप्रीम कोर्ट का आदेश: ‘पाकिस्तान भेजे जाने’ की आशंका पर रोक, दस्तावेज जांच तक याचिकाकर्ता परिवार पर कोई कार्रवाई नहीं

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने बेंगलुरु के एक व्यक्ति और उसके परिवार को पाकिस्तान भेजे जाने की आशंका पर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगा दी है। याचिकाकर्ता परिवार ने दावा किया है कि वे भारतीय नागरिक हैं और उनके पास भारतीय पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन और मतदाता पहचान पत्र जैसे वैध दस्तावेज मौजूद हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को दिए दस्तावेजों की जांच के निर्देश

जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने निर्देश दिया कि जब तक सरकारी अधिकारी उनके नागरिकता संबंधी दस्तावेजों की सत्यता की जांच कर उचित निर्णय नहीं ले लेते, तब तक परिवार के खिलाफ कोई कठोर कदम नहीं उठाया जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता यदि सरकार के निर्णय से असंतुष्ट होता है, तो उसे जम्मू, कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय में अपील करने की स्वतंत्रता होगी।

 

कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह याचिका परिवार के छह सदस्यों की ओर से दायर की गई थी, जिनमें पति-पत्नी और उनके चार बच्चे शामिल हैं। याचिकाकर्ता फिलहाल श्रीनगर में रह रहे हैं। अधिकारियों द्वारा वीजा रद्द किए जाने के बाद निर्वासन की प्रक्रिया शुरू की गई, और कुछ को हिरासत में भी लिया गया है। याचिकाकर्ता भारतीय नागरिक होने का दावा कर रहे हैं और इस दावे की पुष्टि जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह आदेश सिर्फ इस विशेष मामले की परिस्थितियों पर आधारित है और किसी मिसाल के रूप में नहीं देखा जाएगा।

कोर्ट में क्या दी गई दलीलें?

वकील नंद किशोर ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता 1987 में भारत आया था और उसके पास सभी वैध दस्तावेज हैं। परिवार के अन्य सदस्य श्रीनगर में रहते हैं। कोर्ट को यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता के पिता पाकिस्तान के मुजफ्फराबाद से आए थे और उन्होंने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में अपना पासपोर्ट सरेंडर किया था।

इस पर कोर्ट ने पूछा कि याचिकाकर्ता सीधे हाईकोर्ट क्यों नहीं गए, जो ऐसे मामलों की तथ्यात्मक जांच के लिए उपयुक्त मंच है। वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुझाव दिया कि प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क करना बेहतर उपाय होगा।

हालांकि वकील ने आपत्ति जताते हुए कहा कि पूरे परिवार को हिरासत में ले लिया गया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने संतुलन साधते हुए कहा कि जब तक दस्तावेजों की पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक कोई कड़ी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इसमें मानवीय पहलू भी जुड़ा हुआ है।

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