
NEW DELHI : केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें राष्ट्रपति और राज्यपालों को कानून मंजूरी देने के लिए समयसीमा तय करने का प्रस्ताव था। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में एक लिखित जवाब दाखिल कर कहा है कि इस तरह का कदम ‘संवैधानिक अराजकता’ पैदा कर सकता है और यह शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के खिलाफ है। सरकार का यह जवाब सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल 2025 में दिए गए उस आदेश के संदर्भ में आया है, जिसमें कहा गया था कि लंबित बिलों को शीघ्र मंजूरी देने के लिए राष्ट्रपति को तीन महीने और राज्यपाल को एक महीने के भीतर निर्णय लेना होगा।
सरकार के मुख्य तर्क
सरकार ने अपने लिखित जवाब में कई महत्वपूर्ण तर्क दिए हैं:
संविधान में संशोधन का प्रयास: सरकार के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट अपने आदेश के जरिए संविधान में संशोधन नहीं कर सकता। संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की थी, और न्यायालय द्वारा ऐसी समयसीमा थोपना उनके मूल इरादे का उल्लंघन होगा।
केंद्र का कहना है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे उच्च संवैधानिक पद कार्यपालिका के प्रमुख हैं और उन्हें स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार है। उन पर समयसीमा लगाना उनकी शक्तियों का हनन है और यह संवैधानिक ढांचे में बाधा उत्पन्न करेगा।
राजनीतिक संवाद का महत्व: सरकार ने सुझाव दिया कि बिलों पर देरी का समाधान राजनीतिक और संवैधानिक संवाद के माध्यम से होना चाहिए, न कि न्यायालय के हस्तक्षेप से। अगर किसी बिल पर निर्णय लेने में देरी होती है तो उसके कारण बताए जा सकते हैं, लेकिन समयसीमा को बाध्यकारी नहीं बनाया जाना चाहिए। केंद्र का मानना है कि इस तरह की समयसीमा निर्धारित करने से सरकार के एक अंग से उसकी शक्तियों को ‘हड़पना’ होगा, जिससे केंद्र-राज्य संबंधों और संवैधानिक शक्तियों का संतुलन बिगड़ जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला तब शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा कई बिलों पर देरी करने को ‘गैरकानूनी’ बताया था। उस आदेश में कोर्ट ने कहा था कि यदि बिल पर देरी होती है, तो राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकती हैं।
इस महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर अब 19 अगस्त 2025 से पाँच न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ सुनवाई करेगी। इस दौरान सरकार सहित सभी पक्ष यह दलील देंगे कि क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश से संविधान के मूल ढांचे में हस्तक्षेप होगा या नहीं। यह फैसला केंद्र-राज्य संबंधों और संवैधानिक पदों की शक्तियों को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर साबित होगा।




