Reverse Wedding Tradition :बारात लेकर दूल्हे के घर पहुंची दुल्हन, जानिए फिर आगे क्या हुआ..
शिक्षिका अनुमति अपनी बारात लेकर पहुंचीं दूल्हे धीरेंद्र के घर; शिक्षा और समानता की मिसाल बनी अनोखी शादी

विभूतिपुर (समस्तीपुर): शिक्षा और सामाजिक जागरूकता अब उन पुरानी परंपराओं को बदलने लगी है, जो सदियों से समाज में स्थापित थीं। इसका एक जीवंत उदाहरण गुरुवार की रात समस्तीपुर जिले के विभूतिपुर प्रखंड के मानारायटोल में देखने को मिला, जहां एक शिक्षिका ने परंपरागत मान्यताओं की सीमाएं तोड़ते हुए अपनी बारात खुद दूल्हे के दरवाजे तक लेकर पहुंचीं।
कटिहार जिले के बारसोई प्रखंड की रहने वाली शिक्षिका अनुमति की बारात जब दूल्हे लाल बहादुर पंडित के पुत्र और आधारपुर मध्य विद्यालय (गौड़ाबराम, दरभंगा) में सहायक शिक्षक धीरेंद्र कुमार के घर पहुंची, तो माहौल उत्साह, खुशियों और आश्चर्य से भर उठा। स्थानीय लोगों ने दूल्हे के घर पर पहुंची दुल्हन की इस अनोखी बारात का पुरजोर स्वागत किया।
■ परंपरा को तोड़ने वाली ऐतिहासिक रात
समाज में जहां प्रायः दूल्हा बारात लेकर दुल्हन के घर जाता है, वहीं इस शादी ने इस परंपरा को उलट कर नया अध्याय लिख दिया। अनुमति अपनी बारात में अपने परिजनों, रिश्तेदारों और महिलाओं के साथ दूल्हे के घर पहुंचीं। लड़की पक्ष की महिलाएँ और परिजन पूरी सक्रियता के साथ बाराती संस्कृति को निभाते दिखाई दिए।
दूल्हे के घर पहुंचकर: द्वारपूजा, जयमाला, कन्यादान, फेरे आदि सभी रस्में दूल्हे के घर पर ही संपन्न हुईं। विवाह के बाद धीरेंद्र को अनुमति के साथ विदा किया गया। यह क्षण स्थानीय लोगों के लिए बेहद यादगार साबित हुआ।
■ शिक्षा ने तोड़ी वर्जनाएं, दिखाई नई राह
अनुमति और धीरेंद्र—दोनों शिक्षक—ने शिक्षा के साथ जुड़ने पर खुद को सामाजिक परिवर्तन की जिम्मेदारी से भी जोड़ा है। यही कारण है कि यह विवाह सिर्फ दो जीवनों का मिलन नहीं, बल्कि लैंगिक समानता और सामाजिक सुधार का प्रतीक बन गया।
स्थानीय लोगों ने कहा कि विवाह नरेंद्र पंडित की कोशिशों से बिना किसी दिखावे, पूरी सरलता और सौहार्द के माहौल में संपन्न हुआ। बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक सभी ने इसे एक ऐतिहासिक पहल के रूप में देखा।
■ दूल्हे धीरेंद्र की प्रतिक्रिया
धीरेंद्र ने बताया कि उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी कि उनकी शादी इस तरह होगी।
उन्होंने कहा—
“मैं चाहता हूं कि यह शादी कौतूहल न बने, बल्कि शिक्षा और समानता का प्रतीक बने। यदि इससे समाज में सकारात्मक संदेश जाता है, तो यही हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी है।”
■ दुल्हन अनुमति की प्रेरक कहानी
अनुमति मूलतः बांका जिले से जुड़ी हैं। परिवार की बेहतरी के लिए उनके माता-पिता दिल्ली चले गए, जहां उनकी शिक्षा हुई। बीपीएससी के TRE-3 में चयन के बाद उन्होंने बिहार में ही नौकरी चुनी।
अनुमति ने बताया—
“जब शादी की बात हुई, तो मैं चाहती थी कि दोनों परिवार बराबरी की सोच के साथ आगे बढ़ें। शादी का स्थल दूल्हे के घर तय हुआ, और मेरे लिए यह साबित हुआ कि शिक्षा ने मुझे परंपरा की दहलीज लांघने का साहस दिया है।”
उनकी यह पहल उन लड़कियों के लिए प्रेरणा है जो सामाजिक प्रतिबंधों के कारण अपने निर्णय लेने से हिचकती हैं।
■ सामाजिक संदेश देती मिसाल
यह विवाह समाज में लैंगिक समानता, शिक्षा के प्रभाव और सकारात्मक बदलाव की एक मजबूत मिसाल बनकर उभरा है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यह शादी आने वाले समय में एक सामाजिक क्रांति का प्रतीक बनेगी, क्योंकि यह परंपराओं को तोड़कर एक नई दिशा दिखाती है।




