SIR : दावों के लिए समयसीमा बढ़ाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में पहुंची राजद और एआइएमआइएम , सोमवार को सुनवाई
मतदाता सूची से बाहर हुए 65 लाख नामों पर गरमाई सियासत, विपक्ष बोला– "दावे-आपत्तियों की संख्या इतनी बड़ी कि समय बढ़ाना जरूरी"

नयी दिल्ली : बिहार की राजनीति इस वक्त मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर गरमाई हुई है। इसी बीच राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए दावों और आपत्तियों के लिए तय समयसीमा बढ़ाने की मांग की है। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को इन याचिकाओं पर 1 सितंबर (सोमवार) को सुनवाई के लिए सहमति दे दी। गौरतलब है कि दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की अंतिम तिथि भी 1 सितंबर ही तय की गई है। ऐसे में सुनवाई बेहद अहम मानी जा रही है।
वकीलों की दलीलें
राजद की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण और वरिष्ठ वकील शोएब आलम ने दलील दी कि हजारों-लाखों मतदाताओं ने अब तक दावे दाखिल किए हैं, लेकिन संख्या इतनी अधिक है कि समयसीमा बढ़ाना जरूरी हो गया है।
AIMIM की ओर से पेश हुए वकील निजाम पाशा ने कोर्ट को बताया कि–
22 अगस्त को आए आदेश से पहले तक करीब 80,000 दावे दाखिल हुए थे।
आदेश के बाद से अब तक 95,000 नए दावे दायर हो चुके हैं।
“इतनी बड़ी संख्या बताती है कि समय सीमा बढ़ाई जानी चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने याचिकाकर्ताओं से सवाल किया कि उन्होंने यह राहत निर्वाचन आयोग से क्यों नहीं मांगी। इस पर प्रशांत भूषण ने कहा कि आयोग से आग्रह किया गया था, लेकिन उस पर विचार नहीं किया गया।

65 लाख नामों पर बवाल
दरअसल, 14 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को आदेश दिया था कि बिहार की मतदाता सूची से बाहर हुए करीब 65 लाख मतदाताओं का विवरण 19 अगस्त तक प्रकाशित किया जाए। साथ ही अदालत ने यह भी कहा था कि दावों और आपत्तियों के लिए आधार कार्ड सहित 11 दस्तावेजों में से किसी एक को पहचान के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाए।
इसके बाद 22 अगस्त को आए आदेश में कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रभावित लोग ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से अपने दावे प्रस्तुत कर सकते हैं।
राजनीतिक पारा चढ़ा
एसआईआर के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि बिहार में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 7.9 करोड़ से घटकर अब 7.24 करोड़ रह गई है। यानी लाखों मतदाताओं के नाम सूची से बाहर हो गए हैं। यही कारण है कि विपक्षी दलों ने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना लिया है।
राजद का आरोप है कि यह “मतदाताओं को व्यवस्थित तरीके से हटाने की कोशिश” है।
AIMIM कह रहा है कि यह गरीबों और हाशिए पर खड़े वर्गों के वोट काटने की साजिश है।
वहीं, भाजपा और जदयू खेमे का कहना है कि प्रक्रिया पारदर्शी है और किसी को नुकसान नहीं होगा।
अब अगली सुनवाई पर टिकी निगाहें
1 सितंबर को होने वाली सुनवाई बेहद अहम है, क्योंकि उसी दिन दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा भी खत्म हो रही है। यदि सुप्रीम कोर्ट समयसीमा बढ़ाने का आदेश देता है, तो लाखों प्रभावित मतदाताओं को राहत मिल सकती है।




