Advertisement
छत्तीसगढ़ट्रेंडिंग-न्यूज़दिल्लीबड़ी खबरब्रेकिंग न्यूज़

SIR Controversy: चुनाव आयोग में मतभेद की रिपोर्ट पर ECI की सफाई, कहा-‘सर्वसम्मति से हुए फैसले’ जानिए ऑब्जर्वेशन और डिसेंट में क्या है अंतर

नई दिल्ली। SIR Controversy: मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब निर्वाचन आयोग की ओर से स्थिति स्पष्ट की गई है। आयोग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि किसी मुद्दे पर चर्चा के दौरान चुनाव आयुक्तों की ओर से सवाल उठाना, स्पष्टीकरण मांगना या अपनी राय दर्ज करना सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है। इसे अपने आप में औपचारिक ‘डिसेंट’ यानी असहमति नहीं माना जा सकता।

Bank Strike 2026: बैंक कर्मचारियों की हड़ताल, अगले 5 दिनों तक बंद रहेंगे बैंक, आज ही निपटा लें जरूरी काम

आयोग के सूत्रों के मुताबिक, SIR से संबंधित अलग-अलग विषयों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपनी टिप्पणियां जरूर की थीं और अंतिम निर्णय से पहले इन पर विचार भी किया गया। हालांकि, आयोग का कहना है कि किसी भी चुनाव आयुक्त ने अंतिम फैसले के खिलाफ औपचारिक असहमति दर्ज नहीं कराई। ECI के अनुसार, जिन आदेशों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, उन पर तीनों चुनाव आयुक्तों के हस्ताक्षर हैं।

रिपोर्ट में 14 बार आपत्ति दर्ज करने का दावा

रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान SIR से जुड़े फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, इन टिप्पणियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, वोटर डेटा तक पहुंच और SIR से जुड़े कुछ फैसलों की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए थे।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि कुछ कदम दोनों चुनाव आयुक्तों की जानकारी के बिना उठाए जाने पर उन्होंने आपत्ति जताई थी। हालांकि, चुनाव आयोग से जुड़े सूत्र इन टिप्पणियों को औपचारिक ‘डिसेंट’ मानने से इनकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि आयोग की बैठक में सभी सदस्यों को किसी मुद्दे पर अपनी राय रखने का समान अधिकार है और अंतिम निर्णय आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिया जाता है।

ऑब्जर्वेशन और डिसेंट में क्या अंतर है?

तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। किसी मुद्दे पर विचार-विमर्श के दौरान किसी सदस्य की ओर से सवाल पूछना, सुझाव देना या किसी प्रक्रिया पर चिंता व्यक्त करना ऑब्जर्वेशन या टिप्पणी के तौर पर देखा जा सकता है।

वहीं, जब कोई सदस्य अंतिम निर्णय से असहमत होता है और अपनी अलग राय को औपचारिक रूप से दर्ज कराता है, तो इसे डिसेंट कहा जाता है। मौजूदा मामले में चुनाव आयोग का कहना है कि SIR से जुड़े मुद्दों पर टिप्पणियां और सवाल जरूर उठे, लेकिन किसी अंतिम निर्णय के खिलाफ औपचारिक डिसेंट दर्ज नहीं किया गया। आयोग के मुताबिक सभी संबंधित आदेशों पर तीनों सदस्यों की मंजूरी और हस्ताक्षर मौजूद हैं।

SIR से जुड़े किन मुद्दों पर उठे सवाल?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां कई महत्वपूर्ण विषयों से जुड़ी थीं। इनमें नए मतदाता के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में बदलाव, मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस तक अधिकारियों की पहुंच और कुछ राज्यों में SIR से जुड़ी प्रक्रिया शामिल थी। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि कुछ मामलों में मतदाता सूची के डेटा के प्रबंधन और IT सिस्टम के केंद्रीकरण को लेकर सवाल उठाए गए। हालांकि, इन दावों के संदर्भ में चुनाव आयोग की आधिकारिक स्थिति यह है कि सभी अंतिम निर्णय आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए गए।

चुनाव आयोग में पहले भी सामने आ चुका है मतभेद

चुनाव आयोग के इतिहास में सदस्यों के बीच अलग राय सामने आने का यह पहला मामला नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने आदर्श आचार संहिता से संबंधित कुछ मामलों में बहुमत से अलग राय रखी थी। इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से जुड़ी शिकायतें भी शामिल थीं। उस समय आयोग के भीतर अलग राय को रिकॉर्ड करने को लेकर भी चर्चा हुई थी। इसी तरह 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला से जुड़े मामले में अपनी अलग राय रखी थी। उस समय भी आयोग के सदस्यों के बीच मतभेद सार्वजनिक चर्चा का विषय बने थे।

शुरुआत में एक सदस्यीय था चुनाव आयोग

भारत में चुनाव आयोग की वर्तमान तीन सदस्यीय व्यवस्था शुरुआत से नहीं थी। 1950 में निर्वाचन आयोग के गठन के समय इसमें केवल मुख्य चुनाव आयुक्त होते थे। यह व्यवस्था 1989 तक चली। 1989 में दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की गई, लेकिन यह व्यवस्था स्थायी नहीं रही और 1990 में आयोग फिर एक सदस्यीय हो गया। इसके बाद 1993 में दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के साथ तीन सदस्यीय आयोग की व्यवस्था फिर लागू हुई, जो आगे स्थायी व्यवस्था बन गई। कानून के तहत आयोग के सभी सदस्यों की भूमिका महत्वपूर्ण है। मतभेद होने की स्थिति में निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जा सकता है।

रिपोर्ट के बाद विपक्ष ने उठाए सवाल

दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों से जुड़ी रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने इस मुद्दे को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए और कार्रवाई की मांग की। वहीं, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, कांग्रेस नेताओं कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी और जयराम रमेश, आप नेता सौरभ भारद्वाज तथा शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत समेत अन्य विपक्षी नेताओं ने भी रिपोर्ट के आधार पर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। ये राजनीतिक नेताओं की प्रतिक्रियाएं हैं, जिन्हें आयोग की आधिकारिक स्थिति से अलग समझना जरूरी है।

फिलहाल विवाद का केंद्र क्या है?

मौजूदा विवाद मूल रूप से इस बात पर केंद्रित है कि चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई टिप्पणियों और आपत्तियों को सामान्य आंतरिक विचार-विमर्श माना जाए या औपचारिक असहमति। एक ओर प्रकाशित रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से कई बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज किए जाने का दावा है।

Ganesh Visarjan 2026: बप्पा को विदाई देते समय जरूर करें इन मंत्रों का जाप, बरसेगी श्री गणेश की कृपा

SIR Controversy: दूसरी ओर, चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि ये टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा थीं और किसी अंतिम आदेश के खिलाफ औपचारिक डिसेंट दर्ज नहीं हुआ। इसलिए इस पूरे मामले में ‘ऑब्जर्वेशन’ और ‘डिसेंट’ के बीच अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर आयोग की ओर से और स्पष्टीकरण या संबंधित दस्तावेज सामने आने पर तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है। अगर चाहें तो इसी खबर के लिए 4-5 शॉर्ट और दमदार हिंदी हेडलाइन भी बना सकता हूं।

Advertisement
Tags

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Close