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UP Politics: यूपी में चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज, योगी के गढ़ गोरखपुर में BJP की परीक्षा, सपा ने लगाया दांव

यूपी। UP Politics: उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 11 सीटों पर होने वाले चुनाव को आगामी 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों की ताकत परखने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। इनमें गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सीट पर खास नजर है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रभाव वाले पूर्वांचल में इस सीट को लेकर बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबला काफी अहम हो गया है। दोनों दल अपने उम्मीदवारों के समर्थन में संगठनात्मक ताकत झोंक रहे हैं।

इस चुनाव में बीजेपी के ध्रुव कुमार त्रिपाठी और समाजवादी पार्टी के संजयन त्रिपाठी आमने-सामने हैं। उम्मीदवारों के चयन, पार्टी के भीतर असंतोष और प्रभावशाली नेताओं की भूमिका ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। हालांकि, इस सीट के परिणाम को सीधे 2027 विधानसभा चुनाव का संकेत मानने के बजाय शिक्षक मतदाताओं के रुझान और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में देखना होगा।

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गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर दोनों दलों की प्रतिष्ठा दांव पर

गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का विस्तार पूर्वांचल के 17 जिलों तक बताया गया है। इस सीट पर 54 हजार से अधिक शिक्षक मतदाता हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, आजमगढ़ में 8,592 और गोरखपुर में 7,289 मतदाता हैं। ऐसे में इन दोनों क्षेत्रों की भूमिका चुनावी समीकरणों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

बीजेपी की ओर से ध्रुव कुमार त्रिपाठी मैदान में हैं, जिन्हें उत्तर प्रदेश शिक्षक महासंघ का भी समर्थन प्राप्त बताया गया है। वहीं, सपा ने संजयन त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाकर बीजेपी को सीधी चुनौती देने की रणनीति अपनाई है। दोनों दलों के नेता शिक्षक मतदाताओं तक पहुंचने और अपने पक्ष में समर्थन जुटाने में लगे हैं।

बीजेपी से नाराज संजयन त्रिपाठी को सपा ने बनाया उम्मीदवार

इस चुनाव में संजयन त्रिपाठी की उम्मीदवारी चर्चा का प्रमुख कारण बनी हुई है। बताया जा रहा है कि वह लंबे समय से बीजेपी से टिकट पाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन पार्टी ने ध्रुव कुमार त्रिपाठी को प्रत्याशी बनाया। इसके बाद संजयन त्रिपाठी ने बीजेपी छोड़ दी और समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उन्हें पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस घटनाक्रम से चुनावी मुकाबले में नया मोड़ आया। संजयन त्रिपाठी की स्थानीय स्तर पर शिक्षकों के बीच पकड़ और क्षेत्र में उनके संपर्क को सपा अपनी रणनीति का अहम हिस्सा मान रही है।

बीजेपी के लिए चुनौती यह है कि पार्टी से अलग हुए नेता अब उसके उम्मीदवार के खिलाफ मैदान में हैं। हालांकि, इसका वास्तविक असर कितना पड़ेगा, यह मतदाताओं के रुख और चुनाव परिणाम से ही स्पष्ट होगा।

देवेंद्र प्रताप सिंह की नाराजगी से बढ़ी राजनीतिक हलचल

बीजेपी के लिए एक अन्य चर्चा का विषय वरिष्ठ नेता और चार बार के एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह की नाराजगी है। रिपोर्ट के मुताबिक, गोरखपुर में आयोजित एक सम्मेलन के दौरान मंच पर उचित स्थान नहीं मिलने से वह असंतुष्ट हो गए थे। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर की और एक पत्र जारी कर समर्थकों तथा शिक्षकों से अन्याय और अपमान के खिलाफ मतदान करने की अपील की। इस घटनाक्रम ने स्थानीय राजनीतिक हलकों में चर्चाओं को तेज कर दिया है।

देवेंद्र प्रताप सिंह का क्षेत्र में राजनीतिक प्रभाव और शिक्षकों के बीच उनकी पहचान चुनावी समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, उनकी नाराजगी का बीजेपी के उम्मीदवार पर कितना प्रभाव पड़ेगा, इसका आकलन चुनाव परिणाम के बाद ही किया जा सकेगा।

योगी आदित्यनाथ ने संभाली चुनाव प्रचार की कमान

गोरखपुर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मजबूत राजनीतिक आधार माना जाता है। ऐसे में यहां शिक्षक एमएलसी सीट पर बीजेपी की स्थिति को लेकर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर के महंत दिग्विजयनाथ पार्क में शिक्षकों के साथ संवाद किया और बीजेपी उम्मीदवार ध्रुव कुमार त्रिपाठी के समर्थन में मतदान की अपील की।

अपने संबोधन में उन्होंने समाजवादी पार्टी की शिक्षा संबंधी नीतियों और राजनीतिक दृष्टिकोण पर सवाल उठाए। योगी आदित्यनाथ ने सपा और शिक्षा को दो अलग-अलग छोर बताते हुए दोनों के बीच वैचारिक अंतर की बात कही। मुख्यमंत्री की सक्रियता को इस सीट पर बीजेपी की गंभीरता के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी के लिए यह मुकाबला केवल एक विधान परिषद सीट तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्र में अपने संगठन और समर्थन का आकलन करने का अवसर भी है।

अखिलेश यादव की रणनीति से सपा को कितनी उम्मीद?

दूसरी ओर, अखिलेश यादव भी संजयन त्रिपाठी के समर्थन में सक्रिय बताए जा रहे हैं। आजमगढ़, बलिया और देवरिया जैसे इलाकों में सपा की गतिविधियों को शिक्षक मतदाताओं के बीच समर्थन जुटाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। इस चुनाव में सपा की रणनीति का एक अहम पहलू बीजेपी से असंतुष्ट नेताओं को अपने पक्ष में लाना है।

पार्टी को उम्मीद है कि स्थानीय असंतोष और अपने संगठन के समर्थन के जरिए वह मुकाबले को मजबूत बना सकती है। कांग्रेस की ओर से सीधे उम्मीदवार नहीं उतारे जाने की स्थिति में विपक्षी मतों के संभावित बंटवारे को लेकर भी चर्चा है। हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि इसका पूरा फायदा सपा को ही मिलेगा।

क्यों अहम है यह मुकाबला?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक एमएलसी सीट का मुकाबला राजनीतिक दलों के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है। बीजेपी के लिए यह अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में संगठनात्मक एकजुटता और उम्मीदवार के समर्थन को परखने का अवसर है। वहीं, सपा के लिए यह बीजेपी के असंतुष्ट नेताओं के सहारे राजनीतिक बढ़त हासिल करने की कोशिश है। अगर सपा इस सीट पर जीत दर्ज करती है, तो उसे पूर्वांचल में अपनी रणनीति के पक्ष में राजनीतिक संदेश देने का मौका मिल सकता है। दूसरी तरफ, बीजेपी की जीत पार्टी के संगठन और मुख्यमंत्री के प्रभाव को लेकर उसके दावों को मजबूती दे सकती है।

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UP Politics:  फिलहाल, इस चुनाव में उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़, शिक्षक मतदाताओं की प्राथमिकताएं, दलों की संगठनात्मक ताकत और स्थानीय असंतोष जैसे कारक अहम होंगे। ऐसे में गोरखपुर-फैजाबाद सीट का परिणाम पूर्वांचल की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण जरूर होगा, लेकिन 2027 विधानसभा चुनाव की तस्वीर इससे अकेले तय नहीं होगी।

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