Hasdeo Aranya: क्या विकास के नाम पर कुर्बान होंगे जंगल ? विश्व पर्यावरण दिवस से पहले हसदेव पर बड़ा सवाल
रायपुर/सरगुजा। Hasdeo Aranya: देशभर में 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की तैयारियां चल रही हैं। पर्यावरण संरक्षण, पौधारोपण और हरियाली बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े अभियान संचालित किए जा रहे हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य एक बार फिर पर्यावरण और विकास के बीच चल रही बहस का केंद्र बन गया है।
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सरगुजा जिले के उदयपुर क्षेत्र में प्रस्तावित केते एक्सटेंशन कोयला परियोजना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। जानकारी के अनुसार, परियोजना के लिए लगभग 1742 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हो सकता है और लाखों पेड़ों की कटाई की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण को लेकर किए जा रहे दावों पर सवाल उठने लगे हैं।
बढ़ेगी पर्यावरणीय चुनौतियां
हसदेव अरण्य को प्रदेश के सबसे समृद्ध वन क्षेत्रों में गिना जाता है। यह क्षेत्र केवल घने जंगलों तक सीमित नहीं है, बल्कि हजारों आदिवासी परिवारों की आजीविका, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रमुख आधार है। स्थानीय समुदाय लंबे समय से जंगल बचाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई तो इसका असर केवल वन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। जल स्रोतों, जैव विविधता और वन्यजीवों पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उनका मानना है कि जंगलों के खत्म होने से आने वाले वर्षों में पर्यावरणीय चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।
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आदिवासियों की आवाज सत्ता तक नहीं पहुंच रही-टीएस सिंहदेव
वहीं इस मामले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव ने परियोजना पर चिंता जताते हुए कहा है कि यह मुद्दा सिर्फ पेड़ों की कटाई तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरों से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने परियोजना की प्रक्रिया और उसके प्रभावों पर पुनर्विचार की आवश्यकता बताई है। टीएस सिंहदेव ने आरोप लगाया कि सरकार की कार्यप्रणाली किसी निजी कंपनी को लाभ पहुंचाने वाली दिखाई देती है। पर्यावरण, जनभावनाएं और आदिवासियों के अधिकार कहीं पीछे छूटते नजर आ रहे हैं। ग्रामीणों का दर्द भी अब खुलकर सामने आने लगा है। उनका कहना है कि प्रदेश का मुख्यमंत्री स्वयं आदिवासी समाज से आता है, लेकिन हसदेव के आदिवासियों की आवाज सत्ता तक नहीं पहुंच रही। जिन जंगलों को बचाने का वादा किया गया था, उन्हीं जंगलों को खनन के लिए सौंपा जा रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि छत्तीसगढ़ में एक तरफ विश्व पर्यावरण दिवस पर पौधे लगाकर फोटो खिंचवाए जाते हैं, तो दूसरी तरफ लाखों पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी जाती है। सवाल यह है कि पर्यावरण संरक्षण सिर्फ भाषणों और विज्ञापनों तक सीमित है या फिर जंगल बचाने की भी कोई वास्तविक इच्छा है?हसदेव से लेकर मैनपाट तक प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। आंदोलन जारी है, विरोध जारी है, लेकिन जंगलों पर खतरा भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
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Hasdeo Aranya: स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि उनकी आपत्तियों और चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। उनका कहना है कि एक ओर पर्यावरण संरक्षण के संदेश दिए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े वन क्षेत्रों को औद्योगिक परियोजनाओं के लिए चिन्हित किया जा रहा है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जहां देशभर में हरियाली बढ़ाने और प्रकृति संरक्षण के संकल्प लिए जाएंगे। वहीं हसदेव अरण्य का मुद्दा विकास और पर्यावरण के संतुलन पर एक महत्वपूर्ण बहस को भी सामने ला रहा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि भविष्य में इस परियोजना को लेकर क्या निर्णय लिया जाता है और जंगलों तथा स्थानीय समुदायों की चिंताओं का किस प्रकार समाधान किया जाता है।




