बिजली की दरें बढ़ी, सियासत चढ़ी : आम जनता पर भार या जरूरी फैसला? सवालों के घेरे में सरकार की ऊर्जा नीति

रायपुर : छत्तीसगढ़ में बिजली दरों में प्रस्तावित 8 से 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी ने आम जनता से लेकर राजनीतिक गलियारों तक हलचल मचा दी है। राज्य विद्युत नियामक आयोग ने औसतन दरों में बढ़ोतरी का प्रस्ताव रखा है, जिससे प्रदेश के 65 लाख से अधिक उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा असर पड़ सकता है। इसमें घरेलू, वाणिज्यिक, कृषि और बीपीएल उपभोक्ता वर्ग शामिल हैं।
क्या यह बढ़ोतरी वाजिब है?
राज्य सरकार और बिजली विभाग की दलील है कि बिजली उत्पादन लागत में भारी इजाफा हुआ है। कोयले की कीमतों में बढ़ोतरी, ट्रांसमिशन लॉस और खपत में वृद्धि को वजह बताते हुए इस वृद्धि को अपरिहार्य बताया जा रहा है।
छत्तीसगढ़, देश में थर्मल पावर उत्पादन के लिहाज से दूसरे नंबर पर है और करीब 24,000 मेगावाट बिजली उत्पादन करता है। इसके बावजूद राज्य सरकार के अनुसार, उत्पादन क्षमता और मांग में संतुलन बिगड़ चुका है, जिससे खर्च का भार आम उपभोक्ता तक पहुंचाना पड़ रहा है।
सरकार का पक्ष: “नाममात्र की बढ़ोतरी”
उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने सफाई देते हुए कहा है कि, “घरेलू उपभोक्ताओं के लिए सिर्फ 10 पैसे प्रति यूनिट की वृद्धि की गई है, जिसे नियामक आयोग ने आवश्यक विचार-विमर्श के बाद तय किया है।” उन्होंने इसे “बहुत ही नॉमिनल” बताया और कहा कि सरकार उत्पादन लागत और ट्रांसमिशन नुकसान की भरपाई के लिए मजबूर है।
विपक्ष का हमला: “जनता पर आर्थिक हमला”
वहीं विपक्ष यानी कांग्रेस ने इसे सीधे-सीधे आम जनता पर आर्थिक आक्रमण बताया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा, “जब छत्तीसगढ़ राज्य बिजली उत्पादन में सरप्लस है, तो फिर यहां के नागरिकों को अधिक दामों में बिजली क्यों मिल रही है? ये शर्मनाक है। हमारी सरकार में हमने 200 यूनिट तक ‘बिजली बिल हाफ’ योजना दी थी, अब वही जनता लूट का शिकार हो रही है।”
कांग्रेस ने मौजूदा भाजपा सरकार की ऊर्जा नीति को “विफल और जनविरोधी” करार दिया है।
राजनीति बनाम हकीकत
सवाल ये है कि क्या यह दर वृद्धि वास्तव में अपरिहार्य थी? क्या राज्य सरकार के पास कोई वैकल्पिक ऊर्जा नीति या सब्सिडी मॉडल नहीं था जिससे आम जनता को राहत मिलती? क्या उत्पादन क्षमता को समय रहते बढ़ाने पर काम नहीं किया गया?
छत्तीसगढ़ में लगातार गर्मी और औद्योगिकीकरण से बिजली खपत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। विभागीय आंकड़े बताते हैं कि उत्पादन के मुकाबले मांग कहीं अधिक हो चुकी है। हालांकि, राज्य बिजली दूसरे राज्यों को भी निर्यात करता है, ऐसे में जनता यह पूछने को मजबूर है कि जब हम उत्पादक हैं, तो उपभोक्ता बनकर ज्यादा क्यों चुका रहे हैं?
आगे क्या?
राज्य सरकार और नियामक आयोग की अंतिम मंजूरी के बाद बिजली दरों में बढ़ोतरी लागू हो सकती है। यदि ऐसा होता है, तो इसका असर हर वर्ग पर पड़ेगा – आम गृहस्थ से लेकर छोटे व्यापारियों और किसानों तक।
अब निगाह इस बात पर है कि सरकार सब्सिडी, उत्पादन और वितरण में किस तरह का संतुलन बनाती है ताकि आम जनता को महंगाई की इस और मार से राहत मिल सके।




