
रायपुर : भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे काला अध्याय कहे जाने वाले आपातकाल (1975-77) की 50वीं वर्षगांठ पर छत्तीसगढ़ में एक बार फिर सियासत गरमा गई है। इस मौके पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने “मीसा बंदियों” को लोकतंत्र सेनानी बताते हुए उन्हें राजकीय सम्मान देने और रुकी हुई पेंशन बहाल करने की घोषणा की, जिसके बाद प्रदेश की राजनीति में नया राजनीतिक ताप देखने को मिला है।
आपातकाल की परछाई में वर्तमान राजनीति
मुख्यमंत्री निवास में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री साय ने कहा,
“देश में लोकतंत्र की हत्या हुई थी। लाखों लोगों को जेल में ठूंसा गया। ऐसे लोकतंत्र सेनानियों को हम न सिर्फ जीवित रहते हुए सम्मान देंगे, बल्कि मृत्यु उपरांत भी उन्हें राजकीय सम्मान मिलेगा।”
इसके साथ ही उन्होंने घोषणा की कि पिछली सरकार में बंद हुई पेंशन योजना को भी बहाल किया जाएगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब आपातकाल को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर भी बहस तेज़ है।
विपक्ष का पलटवार: “आपातकाल संवैधानिक निर्णय था”
मुख्यमंत्री की इस घोषणा पर कांग्रेस ने पलटवार किया है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा,
“इंदिरा गांधी ने संविधान के दायरे में रहते हुए आपातकाल लागू किया था। बाद में पार्टी ने स्वीकार किया कि कुछ जगह गलतियां हुईं। लेकिन इसे लोकतंत्र की हत्या कहना ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी है।”
कांग्रेस का यह भी कहना है कि लोकतंत्र सेनानियों के नाम पर सरकार राजनीति कर रही है और इस संवेदनशील मुद्दे को भावनात्मक रूप से भुनाने का प्रयास हो रहा है।
पेंशन से लेकर सम्मान तक… सियासत तेज
आपातकाल के दौरान देशभर में 1 लाख से अधिक लोगों को जेलों में बंद किया गया था। इनमें से कई लोगों को अब “मीसा बंदी” कहा जाता है। इन लोगों को लेकर छत्तीसगढ़ की राजनीति में लंबे समय से बहस रही है — खासतौर पर पेंशन योजना और राजकीय सम्मान को लेकर। पिछली कांग्रेस सरकार ने इस योजना को रोक दिया था, जिसे अब भाजपा सरकार ने फिर से शुरू करने का ऐलान किया है।
सवाल वही—सम्मान या सियासत?
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कदम लोकतंत्र सेनानियों को सच्ची श्रद्धांजलि है या फिर एक राजनीतिक चाल? क्या हर वर्ष आपातकाल की वर्षगांठ पर यह मुद्दा भावनाओं की आड़ में राजनीति का मंच बनता रहेगा?
आपातकाल एक ऐतिहासिक सच्चाई है—किसी के लिए सबक, किसी के लिए गर्व और किसी के लिए पीड़ा का स्मरण। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि इसकी परछाई आज भी भारतीय राजनीति पर है। छत्तीसगढ़ में जिस तरह से सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हैं, उससे साफ है कि आपातकाल अब केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीति का एक हथियार बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह बहस ठंडी पड़ती है या हर साल नए सिरे से राजनीतिक तपिश बनाती है।




