
रोमी सिद्दीकी/सरगुजा। हसदेव बचाव आंदोलन के तहत सरगुजा,सूरजपुर व कोरबा जिले के ग्रामीणों के द्वारा जिस प्रकार से लंबे समय से लामबंद होते हुए आंदोलन किया जा रहा है उससे अब जिला प्रशासन व कोयला उत्खनन करने वाली कंपनी के अधिकारियों की परेशानियों काफी बढ़ गई हैं। किसी भी प्रकार से समस्या का हल ढूंढने के लिए अब सीएमडी लेवल के अधिकारी सरगुजा कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक कार्यालय के चक्कर लगाते हुए देखे जा रहे है।
दरअसल, सरगुजा जिले के उदयपुर स्थित परसा केते ओपन कोल माइंस है जो कि राजस्थान पॉवर लिमिटेड को वितरित किया गया हैं। जिसे अडानी कम्पनी के द्वारा कोयला उत्खनन किया जा रहा है। कभी घनघोर जंगल व जंगली जानवरों का निवास स्थान के नाम से जाना जाने वाला परसाकेते अब खुली खदान होने के कारण उजाड़ हो चुका है जंगली जानवरों का पलायन इंसानी बस्तियों की ओर होने से आए दिन मनुष्य और जानवर के बीच संघर्ष होता हैं जो अब काफी बढ़ गया है। यही कारण है कि अब नए खदानों को लेकर क्षेत्र के आदिवासी काफी आक्रोश में आ चुके हैं ग्रामीणों की माने तो नए खदान वो किसी भी कीमत में नहीं चाहते हैं लेकिन दूसरी ओर कोल माइंस करने वाली कंपनी हर कीमत में कोल माइन चाहती है यही कारण है कि ग्रामीणों और माइनिंग कंपनी प्रबंधन के बीच टकराव की स्थिति बन चुकी है।
कोयला उत्खनन करने वाली कंपनी के द्वारा राज्य सरकार व जिला प्रशासन के अधिकारियों के बीच बेहतर तालमेल तो बैठा लिया गया है लेकिन कोल माइंस क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्रामीणों के बीच टकराव की स्थिति दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है यही कारण है कि परसा केते, क्षेत्र सहित उदयपुर, प्रेम नगर, तारा, और अनेक क्षेत्र के ग्रामीणजन अनिश्चितकालीन हड़ताल में बैठ चुके हैं वे किसी भी कीमत में नया खाता खोलना नहीं देना चाहते हैं ग्रामीणों की माने तो नाम खुलने से सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 4 से 5 लाख पेड़ काटे जाएंगे जो इन्हें कतई मंजूर नहीं है। नौबत मारपीट तक की भी आ सकती है ऐसा ग्रामीण खुद कह रहे हैं।
बहरहाल नया कोयला खदान खोलने को लेकर जिस प्रकार से अड़चनें आ रही हैं उसे लेकर अब कोल उत्पन्न कंपनी के माथे पर पसीना आ चुका है कंपनी प्रबंधन धन व बल के आधार पर नया माइंस खोलने को लेकर आतुर है। वहीं जिला व पुलिस प्रशासन का सहयोग भी प्रबंधन को हर तरह से मिल रहा है इसके बावजूद हजारों ग्रामीणों के द्वारा जिस प्रकार से जंगल बचाने को लेकर आंदोलन छेड़ा गया है उससे अब उनके सामने बड़ी मुसीबत आ गई है ऐसे में कोल प्रबंधन के चेयरमैन व मैनेजिंग डायरेक्टर आर के शर्मा अम्बिकापुर के कलेक्ट्रेट कैंपस में टहलते हुए दिखाई पड़े। हालांकि जिले के कलेक्टर संजीव कुमार झा व पुलिस अधीक्षक भावना गुप्ता के साथ उनकी एक अलग-अलग बैठक भी हुई।
इस बारे में शर्मा ने बताया कि सरगुजा जिले में नया कोयला खादान खुलना है। केंद्र और राज्य सरकार के द्वारा जब कोयला उत्थान हेतु स्वीकृति दी गई है तो ऐसे में ग्रामीणों के द्वारा जिस प्रकार से विरोध किया जा रहा है वह सही नहीं है। एक माह का ही कोयल शेष बचा हुआ है ऐसे में समय से कोयला खादान नहीं खुला तो आने वाले समय काफी समस्या हो जाएगा। बहरहाल छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य को काटने के निर्णय से लोग न केवल चिंतित हैं, बल्कि आक्रोशित भी हैं। कोयला खनन के लिए हसदेव अरण्य के करीब 4.50 लाख पेड़ों को काटा जाना है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, सरकार के इस निर्णय का पर्यावरण पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ेगा। हसदेव के जंगल कटने से पेड़ों की 167 प्रजातियां खत्म हो जाएंगी। वहीं हाथी, भालू, तेंदुआ, भेड़िया, धारीदार लकड़बग्धा जैसे दर्जनभर से अधिक वन्य जीवों का रहवास खत्म हो जाएगा। इसके अलावा विलुप्तप्राय चिड़ियों, तितलियों और सरीसृपों की दर्जनों प्रजातियां भी विलुप्त हो जाएंगी।
क्षेत्र में कम से कम 92 पक्षियों की ऐसी प्रजातियां मौजूद हैं। इनमें से 6 अनुसूची-1 में शामिल हैं, जिनमें सफेद आंखों वाली वजर्ड, ब्लैक सोलजर्स काईट आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा तितलियों की लुप्तप्राय प्रजातियां और सरीसृप (राइप्टाइल्स) भी बहुतायत में मौजूद हैं।
क्षेत्र में 167 से ज्यादा प्रजातियों के पेड़-पौधे हैं, जिनमें 18 प्रजातियां बेहद संवेदनशील व संकटग्रस्त हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यहां 74 प्रजाति के वृक्ष, 41 प्रजाति के छोटे वृक्ष, 32 प्रजाति के औषधीय पौधे व घास, 11 प्रजाति की लताएं और 11 काष्ठ लताओं की प्रजाति मिलती हैं।
यहां 23 प्रजाति के सरीसृप और 43 प्रजाति की तितलियां मिलती हैं। यहां अध्ययन के दौरान 31 प्रजाति के स्तनपायी जीव भी मिले हैं, जिनमें से 8 प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं।
हसदेव अरण्य लगे हुए उसके पड़ोसी अचानकमार, कान्हा टाइगर रिजर्व और भोरामदेव वन्य जीव अभ्यारण्य के बीच भौगोलिक जुड़ाव है। वन्य जीवों की आवाजाही को देखते हुए इस क्षेत्र में शेरों की आवाजाही से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
हसदेव अरण्य के विभिन्न हिस्सों से 40-50 हाथी आवाजाही करते हैं। इसके कारण असामान्य रूप से हाथी-मानव संघर्ष में इजाफा हुआ है। यह हाथियों के नैसर्गिक रहवास से छेड़छाड़ का नतीजा है। हाथियों के नैसर्गिक रहवास से पलायन को बढ़ाने वाली कोई भी नकारात्मक गतिविधि इस स्थिति को और भयावह बना देगी, जिसे संभालना मुश्किल हो जाएगा।
हसदेव अरण्य और उसके आसपास मुख्य रुप से आदिवासी बसते हैं, जिनकी आजीविका वन संसाधनों पर निर्भर है। हर महीने की आय में केवल लघु वनोपज का ही 46 फीसदी योगदान होता है। स्थानीय समुदाय की कुल वार्षिक आय का 60 से 70 फीसदी वन आधारित है। इसलिए ये समुदाय इन जंगलों के संरक्षण को प्राथमिकता देते हैं। स्थानीय समुदाय इस जंगल में खनन गतिविधियों का समर्थन नहीं करते, क्योंकि वो इसे जंगलों के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। इसके अलावा समुदायों के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू भी हैं, जिन्हें बचाने के लिए भी यहां खनन का विरोध कर रहे हैं।




