Pitru Paksha 2026: इस मंदिर में जीवित लोग करते हैं अपना ही पिंडदान, पितृपक्ष में हर साल पहुंचते हैं लाखों श्रद्धालु, जानें क्या है मान्यता
गया। Pitru Paksha 2026: पितृपक्ष को हिंदू परंपरा में पूर्वजों के स्मरण और उनके निमित्त श्राद्ध, तर्पण तथा पिंडदान करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। लेकिन बिहार के गया में एक ऐसी परंपरा भी प्रचलित है, जो पितृपक्ष के सामान्य रीति-रिवाजों से बिल्कुल अलग है। यहां कुछ लोग जीवित रहते हुए ही अपना पिंडदान करते हैं। गया के भस्मकूट पर्वत पर स्थित जनार्दन मंदिर इस परंपरा से जुड़ा प्रमुख धार्मिक स्थल माना जाता है। यहां भगवान विष्णु के जनार्दन स्वरूप की पूजा की जाती है। पितृपक्ष के दौरान मंदिर और गया के विभिन्न पिंडवेदी स्थलों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
जनार्दन मंदिर क्यों है खास?
गया को लंबे समय से पिंडदान और श्राद्ध कर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में माना जाता है। यहां पितरों के निमित्त विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इसी परंपरा के बीच जनार्दन मंदिर की आत्मश्राद्ध की परंपरा इसे विशेष बनाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिन लोगों की संतान नहीं है या भविष्य में उनका श्राद्ध और पिंडदान करने वाला कोई उत्तराधिकारी नहीं होगा, वे जीवत रहते हुए ही अपना श्राद्ध करने की परंपरा का पालन करते हैं। इसके अलावा वैराग्य या संन्यास का मार्ग अपनाने वाले कुछ लोग भी इस धार्मिक परंपरा के तहत आत्मश्राद्ध करते हैं।
आत्मश्राद्ध के पीछे क्या है धार्मिक विश्वास?
हिंदू धार्मिक मान्यताओं में पिंडदान और तर्पण को पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का माध्यम माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि गया में किए गए पिंडदान से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। जनार्दन मंदिर से जुड़ी परंपरा में यह विश्वास भी बताया जाता है कि व्यक्ति यदि जीवन रहते अपना श्राद्ध और पिंडदान कर लेता है, तो मृत्यु के बाद उसके परिवार को उसके लिए यह अनुष्ठान करने की आवश्यकता नहीं रहती। हालांकि, यह धार्मिक मान्यता है और अलग-अलग परिवारों तथा परंपराओं में इसके पालन का तरीका अलग हो सकता है।
तीन दिनों में पूरी होती है आत्मश्राद्ध की प्रक्रिया
बताया जाता है कि आत्मश्राद्ध की प्रक्रिया करीब तीन दिनों में पूरी की जाती है। गया पहुंचने के बाद श्रद्धालु सबसे पहले तीर्थ संकल्प और प्रायश्चित से जुड़े धार्मिक कर्म करते हैं। इसके बाद जनार्दन स्वामी मंदिर में पूजा-अर्चना और मंत्र जाप किया जाता है। इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा भगवान जनार्दन को पिंड अर्पित करना है। परंपरा के अनुसार, दही और चावल से तैयार तीन पिंड भगवान को समर्पित किए जाते हैं।
मृत व्यक्ति के श्राद्ध से अलग है यह विधि
आत्मश्राद्ध की इस परंपरा में एक खास बात यह बताई जाती है कि पिंड तैयार करने में तिल का प्रयोग नहीं किया जाता। सामान्य श्राद्ध कर्म में तिल का धार्मिक महत्व माना जाता है, जबकि आत्मश्राद्ध की इस विशेष विधि में अलग प्रक्रिया अपनाई जाती है। पिंड अर्पित करते समय श्रद्धालु भगवान जनार्दन से अपने लिए मोक्ष और आध्यात्मिक कल्याण की प्रार्थना करते हैं। धार्मिक विश्वास के अनुसार, व्यक्ति भगवान को यह संकल्प अर्पित करता है कि शरीर त्यागने के बाद उसे ईश्वर की कृपा से मुक्ति प्राप्त हो।




