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CG Dhan Kharidi Explainer: सरकार की तैयारी बनाम किसानों की मांग… छत्तीसगढ़ में धान खरीदी की आहट, कब शुरू होगी खरीद?

प्रिया जगत/ रायपुर। CG Dhan Kharidi Explainer: छत्तीसगढ़ को यूं ही ‘धान का कटोरा’ नहीं कहा जाता। यहां धान केवल खेती और अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं है, बल्कि प्रदेश की राजनीति का भी बड़ा मुद्दा है। खरीफ सीजन खत्म होने के साथ ही अब किसानों की नजर सरकारी धान खरीदी की तारीख पर टिक गई है। सवाल है कि इस बार खरीदी कब शुरू होगी, किसानों को कितनी राहत मिलेगी और नई व्यवस्था उनके लिए कितनी आसान होगी?

धान की फसल तैयार होने के बाद किसान की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। कटाई से लेकर खरीदी केंद्र तक फसल पहुंचाने, टोकन लेने, तौल कराने और भुगतान मिलने तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है। यही वजह है कि हर साल धान खरीदी शुरू होने से पहले तारीख, पंजीयन, बारदाने, तौल, भुगतान और धान के उठाव जैसे मुद्दे चर्चा में आ जाते हैं। इस बार भी तस्वीर कुछ अलग नहीं है। सरकार अपनी तैयारियों को मजबूत बता रही है, जबकि किसान संगठन और विपक्ष खरीदी की तारीख से लेकर नई डिजिटल व्यवस्था तक कई सवाल उठा रहे हैं।

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पिछले पांच साल में कैसे बढ़ा धान खरीदी का दायरा?

पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो छत्तीसगढ़ में धान खरीदी का पैमाना लगातार बढ़ा है। पंजीकृत किसानों की संख्या और सरकारी खरीदी दोनों में बड़े स्तर पर विस्तार देखने को मिला है।

खरीफ विपणन वर्ष 2025-26

2025-26 में सरकार ने करीब 140 लाख मीट्रिक टन धान खरीदी का लक्ष्य रखा था। 31 जनवरी 2026 तक लगभग 142 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा गया। इस दौरान करीब 27.40 लाख किसान पंजीकृत थे, जिनमें से 25.24 लाख से अधिक किसानों ने धान बेचा। किसानों को करीब 33,149 करोड़ रुपये का भुगतान किए जाने की जानकारी दी गई।

खरीफ विपणन वर्ष 2024-25

2024-25 में धान खरीदी का लक्ष्य करीब 160 लाख मीट्रिक टन था, जबकि वास्तविक खरीदी लगभग 149.25 लाख मीट्रिक टन रही। करीब 25.49 लाख किसान पंजीकृत थे और इनमें से 24.80 लाख से अधिक किसानों ने अपनी उपज सरकारी केंद्रों पर बेची। भुगतान का आंकड़ा 31,089 करोड़ रुपये से अधिक रहा।

खरीफ विपणन वर्ष 2023-24

2023-24 में सरकार ने 130 लाख मीट्रिक टन का लक्ष्य तय किया था। वास्तविक खरीदी करीब 144.92 लाख मीट्रिक टन तक पहुंची। इस साल लगभग 26.85 लाख किसान पंजीकृत थे और करीब 24.72 लाख किसानों ने धान बेचा। किसानों को 32 हजार करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान हुआ।

खरीफ विपणन वर्ष 2022-23

2022-23 में धान खरीदी का लक्ष्य 110 लाख मीट्रिक टन था। इसके मुकाबले लगभग 107.53 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा गया। करीब 24.98 लाख किसान पंजीकृत हुए और 23.42 लाख से अधिक किसानों ने धान बेचा। इस वर्ष भुगतान का आंकड़ा करीब 23 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा रहा।

खरीफ विपणन वर्ष 2021-22

2021-22 में 105 लाख मीट्रिक टन के लक्ष्य के मुकाबले करीब 97.97 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी हुई। करीब 24.05 लाख किसान पंजीकृत थे और लगभग 21.77 लाख किसानों ने धान बेचा। इस दौरान किसानों को करीब 19 हजार करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बीते वर्षों में सरकारी धान खरीदी का दायरा बड़ा हुआ है। हालांकि, खरीदी का बढ़ता आंकड़ा अपने साथ व्यवस्था को लेकर नई चुनौतियां भी लेकर आया है।

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इस बार क्या बदला? एग्रीस्टेक और फार्मर आईडी पर जोर

इस सीजन में किसानों के पंजीयन और भूमि रिकॉर्ड को डिजिटल सिस्टम से जोड़ने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। समर्थन मूल्य पर धान बेचने के लिए एग्रीस्टेक फार्मर आईडी/फार्मर आईडी को महत्वपूर्ण बनाया गया है। पिछले खरीफ सीजन में पंजीकृत किसानों को इस साल भी पंजीकृत माना जाएगा। उनकी भूमि, खसरा और धान के रकबे से जुड़ी जानकारी एग्रीस्टेक के माध्यम से अपडेट की जाएगी।

सबसे ज्यादा चर्चा संयुक्त खातों को लेकर है। यदि किसी जमीन में एक से अधिक सह-खातेदार हैं, तो उनके लिए सहमति और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। यह प्रक्रिया ऑनलाइन भी किए जाने की व्यवस्था बताई गई है, ताकि दूसरे शहरों में रहने वाले सह-खातेदारों को सुविधा मिल सके। वन पट्टाधारी, डूबान क्षेत्र के किसान, शासकीय पट्टेदार, कोटवार और संस्थागत किसानों के लिए भी पंजीयन व्यवस्था लागू रहेगी।

सरकार की दलील है कि डिजिटल रिकॉर्ड से वास्तविक किसान की पहचान सुनिश्चित होगी और खरीदी प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी। दूसरी ओर किसान संगठनों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में डिजिटल प्रक्रियाओं की जटिलता किसानों के लिए नई परेशानी बन सकती है।

किसान संगठन की मांग- 1 नवंबर से शुरू हो धान खरीदी

छत्तीसगढ़ संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य वेगेंद्र कुमार सोनबेर ने खरीदी की तारीख को लेकर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि बड़ी मात्रा में फसल अक्टूबर के अंत तक तैयार हो जाती है। ऐसे में नवंबर के मध्य तक खरीदी शुरू नहीं होने पर किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए इंतजार करना पड़ सकता है।

किसान संगठन का तर्क है कि दीपावली के आसपास किसानों पर मजदूरी, घरेलू खर्च और अन्य आर्थिक जरूरतों का दबाव रहता है। यदि किसान के पास धान तैयार है लेकिन सरकारी खरीदी शुरू नहीं हुई, तो उसे निजी व्यापारियों पर निर्भर होना पड़ सकता है। किसान संगठन की मांग है कि 1 नवंबर से धान खरीदी शुरू की जाए। संगठन का यह भी कहना है कि 1 नवंबर छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस है। इसलिए इस तारीख को धान खरीदी की स्थायी शुरुआत से जोड़ने पर भविष्य में तारीख को लेकर अनिश्चितता कम हो सकती है।

संयुक्त खातों और एग्रीस्टेक पर भी आपत्ति

किसान संगठन की दूसरी बड़ी चिंता संयुक्त खातों को लेकर है। संगठन का कहना है कि एक ही जमीन में कई हिस्सेदार होने की स्थिति में सभी सह-खातेदारों की सहमति और डिजिटल सत्यापन की प्रक्रिया कुछ किसानों के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है। खासकर उन परिवारों में समस्या आ सकती है जहां जमीन के हिस्से को लेकर पहले से विवाद हैं या सह-खातेदार अलग-अलग शहरों में रहते हैं। हालांकि, सरकार की ओर से इस व्यवस्था को डिजिटल पारदर्शिता और वास्तविक किसान की पहचान से जोड़कर देखा जा रहा है।

MSP को लेकर किसान संगठन ने उठाया अलग सवाल

धान की कीमत भी इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसान संगठन का दावा है कि केंद्र की ओर से समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी का पूरा लाभ किसानों तक नहीं पहुंच रहा है। संगठन ने पिछले वर्षों की बढ़ोतरी का हवाला देते हुए करीब 398 रुपये प्रति क्विंटल के अंतर का दावा किया है। 21 क्विंटल प्रति एकड़ के हिसाब से संगठन ने यह अंतर करीब 8,358 रुपये प्रति एकड़ बताया है। इसके साथ ही संगठन ने 2023 से संबंधित कथित चौथी किस्त की बकाया राशि के भुगतान की मांग भी उठाई है। यह आंकड़े किसान संगठन के दावे हैं और इन पर सरकार की ओर से अलग स्पष्टीकरण को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

कांग्रेस का हमला- प्रक्रिया आसान होने के बजाय बढ़ी जटिलता

धान खरीदी को लेकर कांग्रेस भी सरकार पर सवाल उठा रही है। कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रदेश अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला का आरोप है कि मौजूदा व्यवस्था में किसानों के सामने नई प्रक्रियाएं और तकनीकी औपचारिकताएं बढ़ गई हैं। कांग्रेस एग्रीस्टेक के साथ-साथ गिरदावरी और डिजिटल क्रॉप सर्वे जैसे सिस्टम का मुद्दा उठा रही है। पार्टी का कहना है कि इन प्रक्रियाओं के कारण यदि रिकॉर्ड में कोई गलती रह गई तो किसान को सरकारी खरीदी केंद्र तक पहुंचने में परेशानी हो सकती है। कांग्रेस का एक बड़ा सवाल धान के उठाव को लेकर भी है।

खरीदी के बाद धान का उठाव क्यों है बड़ा मुद्दा?

धान खरीदी के बाद उसे केंद्रों से समय पर उठाकर मिलर्स तक पहुंचाना भी बेहद महत्वपूर्ण है। विपक्ष का आरोप है कि उठाव में देरी होने पर खुले में रखे धान को बारिश, नमी और खराब रखरखाव से नुकसान हो सकता है। कांग्रेस का दावा है कि पिछली व्यवस्थाओं में धान के उठाव के लिए समय-सीमा और जवाबदेही तय करने पर जोर दिया जाता था। पार्टी अब खरीदी केंद्रों से धान के त्वरित उठाव और सुरक्षित भंडारण की मांग कर रही है। कांग्रेस का यह भी कहना है कि मिलर्स से बैंक गारंटी जैसी व्यवस्था के जरिए सरकारी धान और चावल के प्रबंधन को अधिक सुरक्षित किया जा सकता है।

‘डबल इंजन’ सरकार पर भी कांग्रेस ने उठाया सवाल

धान खरीदी का मुद्दा केंद्र और राज्य सरकार के बीच तालमेल से भी जोड़ा जा रहा है। कांग्रेस का सवाल है कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने का लाभ छत्तीसगढ़ के किसानों और राज्य की धान अर्थव्यवस्था को किस स्तर पर मिल रहा है। पार्टी का तर्क है कि राज्य में बड़े पैमाने पर धान उत्पादन होता है। ऐसे में केंद्रीय स्तर पर चावल के उठाव की क्षमता बढ़ने से राज्य में खरीदे गए धान का प्रबंधन आसान हो सकता है।

सरकार की तैयारी क्या है?

सरकार की ओर से खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 की खरीदी व्यवस्था को लेकर तैयारियां किए जाने की बात कही जा रही है। सरकार के मुताबिक किसानों की सुविधा के लिए प्रदेश में 360 नए धान खरीदी केंद्र शुरू किए गए हैं। खरीदी केंद्रों पर बारदाने और अन्य जरूरी संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। सरकार का फोकस खरीदी केंद्रों का विस्तार करने के साथ-साथ डिजिटल रिकॉर्ड, बायोमेट्रिक सत्यापन और पंजीयन प्रक्रिया को व्यवस्थित करने पर है।

भाजपा का दावा- किसानों को मिल रहा ज्यादा लाभ

भाजपा के मुख्य प्रदेश प्रवक्ता और सांसद संतोष पांडे का कहना है कि सरकार ने किसानों से धान खरीदी की सीमा बढ़ाई है। उनके मुताबिक प्रति एकड़ 21 क्विंटल तक खरीदी की व्यवस्था और किसानों को अंतर की राशि जैसे फैसले किसान हित से जुड़े हैं। भाजपा का कहना है कि राज्य में धान खरीदी का दायरा बढ़ा है और सरकार किसानों को ज्यादा सुविधा देने के लिए लगातार व्यवस्थाओं में सुधार कर रही है।

बायोमेट्रिक सिस्टम से कितनी बदलेगी व्यवस्था?

धान खरीदी में बायोमेट्रिक आधारित सत्यापन पर भी जोर है। इसका उद्देश्य वास्तविक किसान की पहचान सुनिश्चित करना और फर्जी पंजीयन या किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर धान बेचने जैसी गड़बड़ियों को रोकना बताया जा रहा है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल सिस्टम की पहुंच और तकनीकी जानकारी कितनी प्रभावी है। यदि किसी किसान के दस्तावेज, भूमि रिकॉर्ड, बैंक विवरण या सह-खातेदारों की जानकारी में अंतर है, तो खरीदी के समय समस्या सामने आ सकती है। इसलिए इस व्यवस्था की सफलता सिर्फ डिजिटल सिस्टम बनाने से नहीं, बल्कि किसानों को समय पर सहायता उपलब्ध कराने से भी तय होगी।

वरिष्ठ पत्रकार की नजर में असली चुनौती क्या?

वरिष्ठ पत्रकार राम अवतार तिवारी के मुताबिक छत्तीसगढ़ में धान खरीदी का मुद्दा आर्थिक होने के साथ राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। बड़ी किसान आबादी के कारण हर सरकार धान खरीदी को अपनी प्राथमिकताओं में रखती है। उनके अनुसार असली चुनौती सिर्फ यह बताना नहीं है कि कितने लाख मीट्रिक टन धान खरीदा गया, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि किसान को पूरी प्रक्रिया में कितनी परेशानी हुई। टोकन, तौल, बारदाने, खरीदी के बाद उठाव और भुगतान—इन सभी चरणों में व्यवस्था मजबूत होने पर ही किसान को वास्तविक राहत मिल सकती है।

‘चूहों ने धान खा लिया’ जैसे विवाद क्यों उठते हैं?

धान के भंडारण को लेकर भी प्रदेश में समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि धान के नुकसान की जिम्मेदारी केवल चूहों या मौसम पर डालने के बजाय भंडारण और निगरानी की व्यवस्था की भी समीक्षा होनी चाहिए। यदि खरीदी केंद्रों से धान समय पर उठाकर मिलर्स तक पहुंचता है, तो लंबे समय तक खुले या असुरक्षित स्थान पर भंडारण से होने वाले नुकसान की संभावना कम हो सकती है।

इस बार सरकार के सामने पांच बड़ी चुनौतियां

इस पूरे मामले को समझें तो आगामी धान खरीदी सीजन में सरकार के सामने मुख्य रूप से ये चुनौतियां रहेंगी—

  • किसानों का पंजीयन और एग्रीस्टेक प्रक्रिया समय पर पूरी कराना।
  • संयुक्त खातों में सह-खातेदारों की सहमति और सत्यापन आसान बनाना।
  • खरीदी केंद्रों पर टोकन, तौल और बारदाने की व्यवस्था सुचारू रखना।
  • खरीदे गए धान का समय पर उठाव और सुरक्षित भंडारण सुनिश्चित करना।
  • किसानों को भुगतान में किसी तरह की अनावश्यक देरी से बचाना।

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धान खरीदी की तारीख से ज्यादा जरूरी पूरी व्यवस्था

छत्तीसगढ़ में धान खरीदी हर साल सिर्फ सरकारी कैलेंडर की एक प्रक्रिया नहीं होती। यह लाखों किसानों की आय, परिवार के खर्च और प्रदेश की राजनीति से सीधे जुड़ा विषय है। एक तरफ सरकार रिकॉर्ड खरीदी, नए केंद्र और डिजिटल व्यवस्था के जरिए तैयारी मजबूत होने का दावा कर रही है। दूसरी ओर किसान संगठन जल्द खरीदी शुरू करने और एग्रीस्टेक जैसी प्रक्रियाओं को सरल बनाने की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस खरीदी की तारीख, धान के उठाव और डिजिटल प्रक्रियाओं को लेकर सरकार को घेर रही है, जबकि भाजपा खरीदी की बढ़ती मात्रा और किसानों को मिलने वाले लाभ को अपनी उपलब्धि बता रही है।

CG Dhan Kharidi Explainer: अब असली परीक्षा खरीदी शुरू होने के बाद होगी। किसान को धान बेचने के लिए कितने चक्कर लगाने पड़ते हैं, तौल कितनी आसानी से होती है, धान का उठाव कितनी जल्दी होता है और भुगतान समय पर मिलता है या नहीं—यही वे सवाल हैं जिनसे इस बार धान खरीदी की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी। क्योंकि छत्तीसगढ़ में धान का आंकड़ा सिर्फ लाखों मीट्रिक टन में नहीं मापा जाता, बल्कि किसान के भरोसे और उसकी फसल के सही दाम में भी इसकी असली कीमत तय होती है।

 

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