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CG Politics: छत्तीसगढ़ में चिराग-आठवले की एंट्री से गरमाई सियासत, BJP की रणनीति या कांग्रेस के वोट बैंक पर बड़ा दांव? किसके लिए बनेगी नई चुनौती

रायपुर। CG Politics: छत्तीसगढ़ में 2028 के विधानसभा चुनाव की आहट अभी दूर है, लेकिन सियासी बिसात अभी से बिछने लगी है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान के छत्तीसगढ़ में चुनावी मैदान में उतरने के संकेत और केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले की पार्टी RPI(A) की प्रदेश में सक्रियता ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

दरअसल, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान इस समय छत्तीसगढ़ दौरे पर रायपुर पहुंचे। उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि,’छत्तीसगढ़ में लोक जनशक्ति पार्टी की नई राज्य इकाई स्थापित की जाएगी। पार्टी के भीतर जल्द ही नियुक्तियां की जाएंगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि आगामी चुनावों में पार्टी की सक्रिय मौजूदगी रहेगी। चुनाव के दृष्टिकोण से पार्टी छत्तीसगढ़ में अपना विस्तार करेगी।

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जब उनसे पूछा गया कि, छत्तीसगढ़ में जनशक्ति पार्टी का इकाई स्थापित करने के बाद क्या यहाँ भी आपकी पार्टी बीजेपी को सपोर्ट करेगी? तो इसके जवाब में चिराग पासवान ने कहा कि, समय परिस्थिति को देखते हुए राज्य की इकाई निर्णय लेगी। इसके साथ ही   उन्होंने बताया कि कई राज्यों में हम इंडिविजुअल कार्य कर रहे हैं और इसके अलावा, पार्टी उत्तर प्रदेश व पंजाब में भी चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटी है।

चिराग की एंट्री ने क्यों बढ़ाई हलचल?

चिराग पासवान केंद्र में BJP के प्रमुख सहयोगियों में शामिल हैं। बिहार की राजनीति में उनकी पार्टी का अपना सामाजिक आधार है। अब छत्तीसगढ़ में चुनाव लड़ने और संगठन विस्तार की बात सामने आने के बाद इसे महज एक प्रदेश संगठन खड़ा करने की कवायद के रूप में नहीं देखा जा रहा। छत्तीसगढ़ में BJP और कांग्रेस के बीच मुकाबला कई सीटों पर बेहद करीब रहा है। ऐसे में किसी तीसरे दल का सीमित लेकिन केंद्रित वोट भी चुनाव परिणाम बदल सकता है। यही वजह है कि चिराग की एंट्री ने BJP और कांग्रेस दोनों के लिए राजनीतिक गणित का नया सवाल खड़ा कर दिया है।

कांग्रेस के वोट बैंक पर नजर?

अगर LJP (रामविलास) उन विधानसभा क्षेत्रों में अपना आधार बनाती है जहां कांग्रेस का सामाजिक समर्थन मजबूत है, तो वह कांग्रेस के वोट में सेंध लगा सकती है। चुनाव में किसी पार्टी को 10-15 फीसदी वोट हासिल करना जरूरी नहीं होता। कई बार 2-3 फीसदी वोट का स्थानांतरण भी करीबी सीटों का परिणाम बदल देता है। ऐसे में LJP का सीमित प्रभाव भी BJP के लिए अप्रत्यक्ष रूप से फायदेमंद हो सकता है—बशर्ते उसका वोट BJP के बजाय मुख्य रूप से कांग्रेस के खाते से निकले।

आठवले की राजनीति भी महत्वपूर्ण

बता दें कि, चिराग पासवान से पहले केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले भी छत्तीसगढ़ दौरे पर पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा था कि,’ विपक्ष अब केवल टिप्पणी करने के लिए है वे देश का विकास नहीं कर सकते। इसके साथ ही उन्होंने कहा था कि,प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में विकास तेजी से हो रहा है। तो चिराग पासवान के साथ रामदास आठवले का नाम भी इस पूरे समीकरण को और दिलचस्प बनाता है।

रामदास आठवले की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (A) की राजनीति मुख्य रूप से दलित और आंबेडकरवादी सामाजिक आधार को केंद्र में रखती है। छत्तीसगढ़ में यदि RPI(A) संगठन का विस्तार करती है तो उसका लक्ष्य भी एक खास सामाजिक वर्ग के बीच राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना होगा। यानी NDA के दो सहयोगी दल अलग-अलग सामाजिक आधारों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं। जिसमें चिराग पासवान का अपना सामाजिक आधार है तो आठवले का दलित/आंबेडकरवादी आधार।

यह दोनों विस्तार BJP के साथ राजनीतिक तालमेल में आगे बढ़ते हैं, तो NDA के पास छत्तीसगढ़ में सामाजिक समीकरणों को ज्यादा व्यापक बनाने का अवसर हो सकता है। जो BJP के लिए फायदा, लेकिन एक बड़ा खतरा भी है। क्योंकि  अगर सहयोगी दल स्वतंत्र रूप से बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारते हैं तो वे कांग्रेस के साथ-साथ BJP के वोट भी काट सकते हैं।

विकास उपाध्याय का राजनीतिक हमला

चिराग पासवान के छत्तीसगढ़ में चुनाव लड़ने के ऐलान पर कांग्रेस के पूर्व विधायक विकास उपाध्याय ने BJP पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया है कि NDA के सहयोगी दल अलग-अलग राज्यों में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की तैयारी क्यों कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि, चिराग पासवान केंद्र में BJP के सहयोगी हैं, लेकिन अब उनकी पार्टी छत्तीसगढ़ में भी चुनाव लड़ने की बात कह रही है। इससे साफ है कि NDA के भीतर सीटों और राजनीतिक रणनीति को लेकर मतभेद सामने आ रहे हैं।

विकास उपाध्याय ने कहा कि, पंजाब में भी LJP (रामविलास) ने विधानसभा चुनाव में उतरने की घोषणा की है। अब छत्तीसगढ़ में चुनाव लड़ने की बात सामने आना BJP के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संकेत है। उन्होंने कहा BJP को पहले अपने गठबंधन और सहयोगी दलों के साथ संबंधों पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। आज सहयोगी दल अलग-अलग राज्यों में अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं और दूसरी तरफ BJP लोकतंत्र एवं चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने वालों को जवाब देने के बजाय राजनीतिक बयानबाजी कर रही है। उन्होंने कहा कि, जनता अब सवाल पूछ रही है कि आखिर BJP के सहयोगी दलों को अलग-अलग राज्यों में अपनी राह क्यों तलाशनी पड़ रही है? BJP को इसका जवाब देना चाहिए।

कांग्रेस के लिए भी चुनौती

चिराग पासवान और रामदास आठवले की पार्टियों का छत्तीसगढ़ में विस्तार होने से जितना बीजेपी के लिए खतरा हो सकता है उतना ही कांग्रेस के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। क्योंकि इन दोनों पार्टियां कांग्रेस के मजबूत इलाकों में संगठन खड़ा करती हैं, वहां स्थानीय नेतृत्व तैयार करती हैं और चुनाव लड़ती हैं, तो कांग्रेस के लिए चुनौती बढ़ सकती है। खासकर उन सीटों पर जहां कांग्रेस और BJP के बीच अंतर कम रहा है, तीसरे दल की मौजूदगी चुनावी परिणाम को प्रभावित कर सकती है।

लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि, अगर BJP कमजोर सीटों पर सहयोगी दलों को आगे करती है और सहयोगी दल कांग्रेस का वोट काटते हैं, तो BJP को सीधा फायदा मिल सकता है। इसे “वोट डायवर्जन की रणनीति” के तौर पर भी देखा जा सकता है। हालांकि अभी इसे BJP की घोषित रणनीति कहना जल्दबाजी होगी।

2028 से पहले बड़ा प्रयोग?

मालूम हो की छत्तीसगढ़ में अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना है। उससे पहले चिराग और आठवले जैसे सहयोगियों का संगठन विस्तार BJP के लिए एक तरह का राजनीतिक प्रयोग भी साबित हो सकता है। अगर सहयोगी दल जमीन पर प्रभाव पैदा करते हैं, तो BJP के नेतृत्व वाले NDA का सामाजिक दायरा बढ़ सकता है। अगर वे स्वतंत्र राजनीतिक पहचान मजबूत करते हैं, तो भविष्य में सीट बंटवारे और टिकट वितरण के समय BJP के सामने सहयोगियों की सौदेबाजी की शक्ति भी बढ़ेगी।

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छत्तीसगढ़ में चिराग पासवान और रामदास आठवले की सक्रियता को सिर्फ दो छोटे दलों के विस्तार के रूप में देखना राजनीतिक रूप से अधूरा विश्लेषण होगा। यह BJP के लिए सामाजिक पहुंच बढ़ाने का मौका भी है और गठबंधन प्रबंधन की चुनौती भी। अगर LJP और RPI(A) अपने-अपने सामाजिक आधार को मजबूत करते हुए कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाती हैं, तो BJP को इसका सीधा राजनीतिक लाभ मिल सकता है। लेकिन अगर दोनों दल स्वतंत्र पहचान के साथ BJP के पारंपरिक वोटरों के बीच भी जगह बनाने लगते हैं, तो यही रणनीति BJP के लिए परेशानी का कारण बन सकती है।

CG Politics: फिलहाल छत्तीसगढ़ की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि चिराग पासवान चुनाव लड़ेंगे या नहीं। उनके चुनावी मैदान में उतरने से बीजेपी या कांग्रेस किसका खेल बिगड़ सकता है। जिसका जवाब 2028 के चुनावी समीकरण की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

 

 

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