Explainer Sukhdev Bhagat: बस्तर दौरे पर जाएंगे सुखदेव भगत, बाढ़- अधूरे विकास कार्य और बोधघाट के बहाने कांग्रेस का ‘मिशन बस्तर’, सरकार के सामने विपक्ष की नई चुनौती
प्रिया जगत/ रायपुर। Explainer Sukhdev Bhagat: छत्तीसगढ़ का बस्तर एक बार फिर बारिश और बाढ़ के साथ-साथ सियासी बहस के केंद्र में है। मानसून के दौरान बस्तर के कई इलाकों में बाढ़ और जलभराव की स्थिति बनना नया नहीं है, लेकिन इस बार प्राकृतिक आपदा के बीच राजनीतिक गतिविधियां भी तेज हो गई हैं। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी सुखदेव भगत बस्तर के दौरे पर रहेंगे और बाढ़ प्रभावित इलाकों में जाकर लोगों से मुलाकात करेंगे। यानी कांग्रेस के लिए यह दौरा सिर्फ बाढ़ प्रभावितों का हाल जानने तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि बस्तर में संगठन को सक्रिय करने और स्थानीय मुद्दों को राजनीतिक एजेंडे में प्रमुखता देने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है।
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बाढ़ बनी सियासी मुद्दे की नई जमीन
हालिया भारी बारिश से बस्तर संभाग के कई हिस्से प्रभावित हुए थे। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सितंबर के अंत में प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वे किया था और राहत शिविरों में लोगों से मुलाकात की थी। मुख्यमंत्री के अनुसार 571 गांवों में 22,377 लोग प्रभावित हुए और करीब 16 हजार लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया था। सरकार की ओर से राहत और सहायता के दावे किए गए हैं।
वहीं कांग्रेस का आरोप है कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत और स्थायी समाधान को लेकर सरकार की तैयारी पर्याप्त नहीं है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने भी बस्तर में बाढ़ और अधोसंरचना के मुद्दे पर सरकार को घेरा है। यहीं से बाढ़ का मुद्दा राहत और पुनर्वास से आगे बढ़कर सियासी बहस का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।
दीपक बैज पहले से कर रहे हैं ग्राउंड कैंपेन
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के लिए बस्तर राजनीतिक और संगठनात्मक दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण है। वे खुद बस्तर से आते हैं और पिछले दिनों बाढ़, सड़क, पुल और दूसरी आधारभूत सुविधाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं। बाढ़ प्रभावित जगदलपुर के इलाकों में बैज के पहुंचने और प्रभावित परिवारों से मुलाकात की भी खबरें सामने आई थीं।
अब सुखदेव भगत का दौरा इस गतिविधि को प्रदेश स्तर के कांग्रेस संगठन से जोड़ता है। एक तरफ प्रदेश अध्यक्ष स्थानीय मुद्दों को उठा रहे हैं, तो दूसरी ओर प्रदेश प्रभारी संगठनात्मक बैठकें और प्रभावित इलाकों का दौरा करने जा रहे हैं।यही वजह है कि कांग्रेस के बस्तर अभियान को केवल एक दौरे के बजाय ग्राउंड कनेक्ट मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
बाढ़ के बाद अब बोधघाट पर भी सियासत
बस्तर की राजनीति में दूसरा बड़ा मुद्दा बोधघाट परियोजना है। हाल के दिनों में इस परियोजना को लेकर कांग्रेस और सरकार के बीच बहस फिर तेज हुई है। दीपक बैज ने परियोजना से संभावित डूबान और विस्थापन को लेकर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने परियोजना के सिंचाई लाभ और संभावित डूबान दोनों को साथ रखकर निर्णय लेने की बात कही है।
वन मंत्री केदार कश्यप की ओर से भी सरकार का पक्ष सामने आया है। उन्होंने परियोजना को बस्तर के लिए बड़ी योजना बताते हुए सिंचाई क्षमता का हवाला दिया है। इसका मतलब साफ है—बाढ़ की चर्चा के साथ अगर बोधघाट का मुद्दा भी जुड़ता है, तो आने वाले दिनों में बस्तर में विकास बनाम विस्थापन और पर्यावरण बनाम सिंचाई की बहस और तेज हो सकती है।
नंदराज पर्वत और स्थानीय आंदोलनों पर भी नजर
बस्तर में प्राकृतिक संसाधन, जंगल और जमीन से जुड़े सवाल पहले से संवेदनशील रहे हैं। ऐसे में स्थानीय ग्रामीण आंदोलनों, विस्थापन, खनन और पर्यावरण से जुड़े मुद्दे भी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यदि कांग्रेस बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के दौरे के साथ स्थानीय ग्रामीण संगठनों और ऐसे आंदोलनों से जुड़े लोगों के बीच भी पहुंच बनाती है, तो उसका अभियान व्यापक राजनीतिक रूप ले सकता है। हालांकि, अभी इसे कांग्रेस की घोषित रणनीति के रूप में नहीं, बल्कि संभावित राजनीतिक विस्तार के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
BJP का पलटवार—बाढ़ के समय सरकार मैदान में थी
कांग्रेस के आरोपों पर भाजपा की ओर से भी प्रतिक्रिया आई है। भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने सुखदेव भगत के बस्तर दौरे पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि बाढ़ के दौरान वे प्रभावित लोगों के बीच नहीं पहुंचे और अब स्थिति सामान्य होने के बाद राजनीतिक गतिविधि कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री साय बाढ़ के दौरान प्रभावित इलाकों में पहुंचे थे और सरकार ने राहत की व्यवस्था की। इस तरह दोनों दलों के बीच विवाद का केंद्र अब केवल बाढ़ से हुए नुकसान तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी बन गया है कि आपदा के दौरान कौन जमीन पर था और किसने प्रभावितों की आवाज उठाई।
राजनीतिक विश्लेषण: बस्तर क्यों है इतना अहम?
बता दें कि, बस्तर छत्तीसगढ़ की राजनीति में सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि आदिवासी राजनीति, प्राकृतिक संसाधनों, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों, विकास परियोजनाओं और स्थानीय अधिकारों से जुड़े कई मुद्दों का केंद्र है। यही कारण है कि बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा भी यहां जल्दी ही प्रशासनिक मुद्दे से राजनीतिक मुद्दे में बदल सकती है। कांग्रेस के लिए बस्तर में स्थानीय संगठन को मजबूत करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज इसी क्षेत्र से आते हैं। वहीं भाजपा के लिए सरकार की विकास योजनाओं और राहत कार्यों को जमीन पर दिखाना उतना ही महत्वपूर्ण है।
बस्तर में माओवादी हिंसा के खिलाफ सरकार ने बड़ी सफलता का दावा किया है। केंद्र सरकार की ओर से मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने और बस्तर में माओवादी गतिविधियों के निर्णायक अंत की बात कही गई है। सरकार का तर्क है कि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के बाद अब उन इलाकों तक विकास और सरकारी योजनाओं की पहुंच बढ़ाने का रास्ता ज्यादा खुला है। कांग्रेस इसलिए भी बस्तर को फोकस कर रही है..ताकि विकास, आदिवासी संस्कृति,जल जंगल जमीन के मुद्दे पर खुद को हितैषी साबित करके आदिवासी जनता के दिलो में सॉफ्ट कॉर्नर क्रिएट कर सके।
Explainer Sukhdev Bhagat: वहीं राजनीतिक लिहाज से बस्तर का महत्व इसलिए भी काफी ज्यादा है क्योंकि बस्तर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आठ विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें बस्तर, जगदलपुर और चित्रकोट समेत संबंधित विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं; जिला प्रशासन के चुनाव पोर्टल पर बस्तर जिले के 85-बस्तर, 86-जगदलपुर और 87-चित्रकोट विधानसभा क्षेत्रों की जानकारी उपलब्ध है। ऐसे में बस्तर में विकास और आदिवासी मुद्दों को लेकर राजनीतिक सक्रियता केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका असर पूरे संभाग और आदिवासी राजनीति के व्यापक विमर्श पर पड़ सकता है।




