Dussehra 2026: दशहरे पर क्यों बांटे जाते हैं आपटा के पत्ते? इन्हें कहते हैं सोना, शमी पूजा का भी है खास महत्व
दशहरे पर आपटा के पत्तों को क्यों कहा जाता है सोना?
महाराष्ट्र में विजयादशमी के दिन आपटा के पत्ते बांटने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इस दिन लोग अपने परिवार, दोस्तों, रिश्तेदारों और परिचितों को आपटा के पत्ते देकर शुभकामनाएं देते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन पत्तों को सोने का प्रतीक माना जाता है। इन्हें एक-दूसरे को भेंट करना सुख-समृद्धि, खुशहाली और आर्थिक उन्नति की कामना से जुड़ा है। इस परंपरा के जरिए लोग अपने प्रियजनों के जीवन में तरक्की और सौभाग्य आने की प्रार्थना करते हैं। यही वजह है कि दशहरे पर आपटा के पत्तों को प्रतीकात्मक रूप से ‘सोना’ कहा जाता है। इस दिन इन पत्तों का आदान-प्रदान केवल एक रस्म नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सम्मान और मंगलकामनाओं को व्यक्त करने का माध्यम भी माना जाता है।
शमी के पेड़ की पूजा का क्या है महत्व?
विजयादशमी पर शमी के पेड़ की पूजा करने की परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। धार्मिक मान्यताओं में शमी को विजय, साहस और शक्ति से जोड़कर देखा जाता है। इसके पीछे महाभारत से जुड़ी एक प्रचलित कथा बताई जाती है। मान्यता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान अपने अस्त्र-शस्त्र शमी के पेड़ में छिपाकर रखे थे। अज्ञातवास की अवधि पूरी होने के बाद अर्जुन ने इसी पेड़ से अपने हथियार वापस निकाले और युद्ध के लिए तैयार हुए। इस कथा के कारण शमी के पेड़ को विजय और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है। दशहरे पर इसकी पूजा करके लोग जीवन में सफलता, शक्ति और बाधाओं पर विजय की कामना करते हैं।
विजयादशमी पर इन परंपराओं का संदेश
Dussehra 2026: दशहरे पर आपटा के पत्ते बांटने और शमी के पेड़ की पूजा करने की परंपराएं भारतीय संस्कृति की विविधता को दर्शाती हैं। जहां आपटा के पत्ते सुख-समृद्धि और शुभकामनाओं का प्रतीक हैं, वहीं शमी पूजा को विजय, साहस और शक्ति से जोड़कर देखा जाता है। इस तरह विजयादशमी केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्व शुभ शुरुआत, आपसी सद्भाव और जीवन में सकारात्मकता का संदेश भी देता है।




