अरावली पर्वत को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बदली परिभाषा, 100 मीटर के फॉर्मूले के बाद देशभर में क्यों हो रहा विरोध..
केंद्र सरकार की सिफ़ारिशों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की जिस परिभाषा को स्वीकार किया है, उसके अनुसार आसपास की ज़मीन से कम से कम 100 मीटर (328 फीट) ऊंचे ज़मीन के हिस्से को ही अरावली पहाड़ी माना जाएगा। अब तक खनन को लेकर अलग-अलग नियम लागू थे। जिसका नतीजा- पारदर्शिता की कमी और व्यापक भ्रम रहा। अब इसी असमानता को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी का गठन किया, ताकि सभी राज्यों के लिए एक समान खनन नीति बनाई जा सके।
बता दें कि, इस साल कमेटी ने अपनी सिफारिशें सुप्रीम कोर्ट को सौंपीं, जिन्हें नवंबर में मंजूरी दे दी गई। इसमें सबसे अहम बात सुप्रीम कोर्ट के ये आदेश अरावली को बचाने के लिए हैं, न कि उसे नुकसान पहुंचाने के लिए है। कमेटी की दो प्रमुख सिफारिशें सौंपी। जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी। जिसमें कहा कि, सिर्फ 100 मीटर या उससे ऊंची पहाड़ियों को अरावली पर्वतमाला का हिस्सा माना जाएगा यानी ऐसी पहाड़ियों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।
Aravalli Mountains: वहीं अगर 100 मीटर ऊंची दो पहाड़ियों के बीच की दूरी 500 मीटर से कम है तो उस पूरे क्षेत्र को अरावली पर्वत श्रृंखला माना जाएगा और वहां भी खनन की अनुमति नहीं होगी। सरकार के अनुसार, इन नियमों से अरावली का लगभग 90% क्षेत्र संरक्षित रहेगा। केवल 0.19% हिस्से में ही खनन होगा-जो करीब 278 वर्ग किलोमीटर है। लेकिन अब इस फॉर्मूले को लेकर देशभर में विरोध हो रहा है। वहीं इस बात पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है क्योंकि पर्यावरणविदों का दावा है कि कानूनी सुरक्षा की कमी के चलते नई परिभाषा इस क्षेत्र के 90% हिस्से को खत्म कर सकती है।




