Raksha Bandhan Special: जब मेवाड़ की रानी ने मुगल बादशाह हुमायूं को भेजी थी राखी, रखी थी इस चीज की मांग, रक्षाबंधन पर जानें कर्णावती की चर्चित कहानी
Raksha Bandhan Special: भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और रक्षा के संकल्प का पर्व रक्षाबंधन आते ही इससे जुड़ी कई ऐतिहासिक और लोकप्रचलित कथाएं चर्चा में आ जाती हैं। ऐसी ही एक बेहद चर्चित कहानी मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूं से जुड़ी है। इस कथा में एक हिंदू रानी द्वारा मुस्लिम शासक को राखी भेजकर भाई का रिश्ता कायम करने और संकट के समय मदद मांगने की बात कही जाती है। हालांकि, इस कहानी की ऐतिहासिक प्रमाणिकता को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद रहे हैं। फिर भी सदियों से यह प्रसंग रक्षाबंधन के मौके पर भाईचारे और रिश्तों की मिसाल के रूप में सुनाया जाता रहा है।
कौन थीं रानी कर्णावती?
रानी कर्णावती मेवाड़ के प्रसिद्ध शासक राणा सांगा की पत्नी थीं। राणा सांगा के निधन के बाद उनके पुत्र विक्रमादित्य सिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठे। उस समय उनकी उम्र कम होने के कारण शासन की जिम्मेदारी काफी हद तक रानी कर्णावती के हाथों में रही। इसी दौर में मेवाड़ के सामने कई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी हो गईं। गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने मेवाड़ पर हमला किया और चित्तौड़गढ़ पर दबाव बढ़ने लगा।
संकट के समय हुमायूं को भेजी राखी
ऐतिहासिक कथा के अनुसार, जब रानी कर्णावती को लगा कि मेवाड़ गंभीर संकट में है, तब उन्होंने मुगल बादशाह हुमायूं को एक पत्र के साथ राखी भेजी। कहा जाता है कि रानी ने हुमायूं को भाई मानते हुए उनसे मेवाड़ की रक्षा के लिए सहायता मांगी थी। इस प्रसंग को अक्सर रक्षाबंधन की उस भावना से जोड़ा जाता है, जिसमें राखी केवल एक धागा नहीं बल्कि भरोसे और सुरक्षा के वचन का प्रतीक मानी जाती है। कथा के मुताबिक, हुमायूं ने राखी को स्वीकार करते हुए रानी की सहायता के लिए अपनी सेना भेजने का निर्णय लिया। हालांकि, उसकी सेना समय रहते चित्तौड़गढ़ नहीं पहुंच सकी।
चित्तौड़गढ़ पर हुआ हमला
हुमायूं की सहायता पहुंचने से पहले ही बहादुर शाह की सेना ने चित्तौड़गढ़ पर कब्जा कर लिया। इसके बाद रानी कर्णावती और अन्य राजपूत महिलाओं द्वारा 8 मार्च 1535 को जौहर किए जाने का उल्लेख मिलता है। इस घटना को मेवाड़ के इतिहास के प्रमुख जौहर प्रसंगों में गिना जाता है। रानी कर्णावती का नाम इसके बाद मेवाड़ के इतिहास में साहस, त्याग और बलिदान से जुड़े प्रसंग के रूप में याद किया जाने लगा।
क्या वाकई हुमायूं को भेजी गई थी राखी?
इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता है। रानी कर्णावती और हुमायूं के बीच राखी भेजे जाने की घटना लोकप्रिय इतिहास और लोककथाओं में काफी प्रसिद्ध है, लेकिन कई इतिहासकारों ने इसके प्रमाणों पर सवाल उठाए हैं। इतिहास के उपलब्ध समकालीन स्रोतों में इस घटना का स्पष्ट और सीधा उल्लेख नहीं मिलने के कारण यह विवाद बना हुआ है कि राखी भेजने की घटना वास्तव में उसी रूप में हुई थी या बाद के समय में यह कहानी लोकप्रिय हुई।
इतिहास से आगे भाईचारे का संदेश
Raksha Bandhan Special: ऐतिहासिक तथ्य को लेकर मतभेद होने के बावजूद रानी कर्णावती और हुमायूं की राखी वाली कहानी आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय है। इसकी वजह इसमें छिपा भाईचारे, विश्वास और रक्षा के वचन का संदेश है। रक्षाबंधन के अवसर पर यह कहानी यह याद दिलाती है कि रिश्तों की भावना कई बार धर्म और राजनीतिक सीमाओं से आगे जाकर भी लोगों को जोड़ने का प्रतीक बन सकती है। यही वजह है कि सदियों पुराना यह प्रसंग आज भी रक्षाबंधन की चर्चित कहानियों में शामिल है।




