Snan Purnima 2026: 108 घड़ों के पानी से हुआ महाप्रभु जगन्नाथ का स्नान, 14 दिन नहीं देंगे दर्शन
पुरी। Snan Purnima 2026: सनातन परंपरा और आस्था के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में से एक देव स्नान पूर्णिमा सोमवार को श्रीजगन्नाथ धाम पुरी में पूरे धार्मिक उत्साह और वैदिक रीति-रिवाजों के साथ मनाई गई। इस पावन अवसर पर भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा, सुदर्शन और मदनमोहन का भव्य महाअभिषेक किया गया। इसी दिन से विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा की धार्मिक प्रक्रियाओं का शुभारंभ माना जाता है।
मंदिर की परंपरा के अनुसार. सुबह की दैनिक पूजा-अर्चना और विशेष अनुष्ठानों के बाद महाप्रभु और अन्य विग्रहों को गर्भगृह से बाहर निकालकर स्नान मंडप तक लाया गया। पारंपरिक पहंडी विजय के दौरान हजारों श्रद्धालु भगवान के दिव्य स्वरूप के दर्शन कर सकेंगे। यह वर्ष का एकमात्र अवसर होता है, जब भगवान खुले मंच से भक्तों को दर्शन देते हैं।
महाअभिषेक के लिए मंदिर परिसर स्थित स्वर्ण कूप (सुना कुआं) से पवित्र जल निकाला जाता है। इस जल को चंदन, केसर, कपूर, अगर, पुष्प और विभिन्न औषधीय जड़ी-बूटियों से सुगंधित कर 108 पवित्र कलशों में भरा जाता है। इन्हीं कलशों के जल से भगवानों का राजकीय स्नान संपन्न होता है।
धार्मिक परंपरा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ का 35 कलश, भगवान बलभद्र का 33 कलश, देवी सुभद्रा का 22 कलश और सुदर्शन का 18 कलश के पवित्र जल से अभिषेक किया जाता है। वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद और घंटियों की गूंज के बीच होने वाला यह अनुष्ठान जगन्नाथ संस्कृति की सबसे भव्य धार्मिक परंपराओं में गिना जाता है।
मान्यता है कि शीतल जल से महाअभिषेक के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद उन्हें अनासार गृह में 14 दिनों के विश्राम के लिए ले जाया जाता है। इस अवधि में भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं और केवल दैतापति सेवक विशेष आयुर्वेदिक औषधियों और पारंपरिक विधियों से उनकी सेवा करते हैं।
Snan Purnima 2026: अनासार अवधि समाप्त होने के बाद भगवान नवयौवन दर्शन देते हैं। इसके पश्चात भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा भव्य रथों पर विराजमान होकर विश्वविख्यात रथयात्रा महापर्व में लाखों श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं। यही परंपरा सदियों से पुरी की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख आधार मानी जाती है।




