Rakshabandhan 2026: पूरा देश मनाता है राखी का त्योहार, लेकिन इस गांव में मनाया जाता है मातम, वजह जानकर रह जाएंगे हैरान
सुराना गांव में रक्षाबंधन नहीं मनाया जाता, नरसंहार की याद में मनाते हैं शोक
Rakshabandhan 2026: गाजियाबाद के सुराना गांव में सदियों से रक्षाबंधन नहीं मनाया जाता। ग्रामीण राखी के दिन कथित नरसंहार में मारे गए पूर्वजों की याद में शोक मनाते हैं। दिल्ली-मेरठ मार्ग से करीब 14 किलोमीटर दूर हरनंदी नदी के किनारे बसे सुराना गांव में रक्षाबंधन को अशुभ घटना से जोड़कर देखा जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, अतीत में कुछ लोगों ने इस दिन रक्षाबंधन मनाने की कोशिश की, लेकिन इसके बाद गांव में अप्रिय घटनाएं होने लगीं। इसके चलते परंपरा को आगे नहीं बढ़ाया गया।
तराईन के युद्ध से जुड़ी है मान्यता
ग्रामीणों की मान्यता के अनुसार, सुराना गांव की स्थापना यदुवंशी अहीर समुदाय के लोगों ने की थी। बताया जाता है कि 1192 में तराईन के द्वितीय युद्ध के बाद पृथ्वीराज चौहान की सेना के कुछ सैनिकों ने गांव में शरण ली थी।
लोककथा के अनुसार, उनका पीछा करते हुए मोहम्मद गौरी की सेना सुराना पहुंची और ग्रामीणों से शरण लिए सैनिकों को सौंपने की मांग की। ग्रामीणों ने इनकार कर दिया। इसके बाद संघर्ष हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण और योद्धा मारे गए। मान्यता है कि यह घटना रक्षाबंधन के दिन हुई थी।
ग्रामीणों के मुताबिक, युद्ध के दौरान कई योद्धाओं ने अपनी बहनों से राखी बंधवाकर युद्ध में हिस्सा लिया था। बाद में गांव के बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के मारे जाने की भी कथा प्रचलित है। इसी घटना की स्मृति में गांव में रक्षाबंधन को उत्सव के बजाय शोक दिवस के रूप में देखा जाता है।
रक्षाबंधन पर सूनी रहती हैं कलाइयां
ग्रामीणों का कहना है कि रक्षाबंधन के दिन गांव में सामान्य त्योहार जैसा माहौल नहीं होता। जहां दूसरे स्थानों पर भाई अपनी बहनों से राखी बंधवाते हैं, वहीं सुराना में लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में इस दिन उत्सव से दूर रहते हैं।
गांव के लोगों के अनुसार, यह परंपरा केवल धार्मिक मान्यता नहीं बल्कि उनके पूर्वजों से जुड़ी ऐतिहासिक स्मृति का हिस्सा है, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया जा रहा है।
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भैयादूज पर पूरी होती है रक्षाबंधन की कमी
सुराना गांव में रक्षाबंधन नहीं मनाने के बावजूद भाई-बहन के रिश्ते का पर्व पूरी तरह छूटता नहीं है। ग्रामीण भैयादूज को धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन बहनें भाइयों के माथे पर तिलक लगाती हैं और भाई-बहन का मिलन उत्सव के रूप में होता है।ग्रामीणों के मुताबिक, रक्षाबंधन की कमी भैयादूज के पर्व पर पूरी की जाती है।** इस तरह सदियों पुरानी परंपरा के साथ भाई-बहन के स्नेह की परंपरा भी गांव में कायम है।




