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राज्यपाल के दौरे से गरमाई सियासत: समीक्षा बैठकों पर कांग्रेस का हमला, भाजपा का पलटवार

 

रायपुर : छत्तीसगढ़ की राजनीति इस समय एक नई बहस के केंद्र में है — संवैधानिक मर्यादा बनाम प्रशासनिक हस्तक्षेप। बीते कुछ हफ्तों से राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष के लगातार जिलों में दौरे और प्रशासनिक बैठकों की अध्यक्षता को लेकर सियासी हलकों में सवाल खड़े हो गए हैं। विपक्ष ने जहां इसे “संविधान का उल्लंघन” बताते हुए राष्ट्रपति शासन जैसी स्थिति करार दिया है, वहीं सत्ता पक्ष इसे “राज्य हित में सामान्य प्रक्रिया” बता रहा है।

 

कांग्रेस के तीखे सवाल:

कांग्रेस ने इन बैठकों को लेकर राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल खड़ा किया है। पार्टी का कहना है कि जब प्रदेश में चुनी हुई सरकार और जिम्मेदार मुख्यमंत्री मौजूद हैं, तो राज्यपाल द्वारा अधिकारियों से सीधे बैठकें लेना संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा,

“मुख्यमंत्री कौन है? सरकार कौन चला रहा है? अगर राज्यपाल ही अफसरों से विकास की समीक्षा करेंगे, तो क्या प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग गया है? क्या मुख्यमंत्री और मंत्री अक्षम हैं?”

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा,

“राज्यपाल का पद प्रतीकात्मक होता है। वे अधिकारियों को सीधे निर्देश देकर न सिर्फ सरकार की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं, बल्कि संविधान से बाहर जाकर काम कर रहे हैं। इससे यही सवाल उठता है कि भाजपा को अपने ही मुख्यमंत्री पर भरोसा नहीं है क्या?”

भाजपा का पलटवार:

राज्यपाल के दौरों को लेकर सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर निशाना साधा है। कैबिनेट मंत्री राम विचार नेताम ने कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा,

“राज्यपाल अगर जिलों का दौरा कर रहे हैं, तो इसमें क्या गलत है? वह जनता से संवाद कर रहे हैं, हालात की समीक्षा कर रहे हैं, कोई आदेश नहीं दे रहे। कांग्रेस को यह विकास दिखता नहीं, इसलिए बौखलाहट में ऐसे बयान दे रही है।”

संसदीय कार्य मंत्री केदार कश्यप ने भी कांग्रेस पर तीखा कटाक्ष करते हुए कहा,

“भूपेश बघेल इतने बड़े नेता हैं, उन्हें ऐसी हल्की राजनीति नहीं करनी चाहिए। यह दौरे राज्य के हित में हैं, न कि किसी सियासी एजेंडे के तहत।”

संवैधानिक मर्यादा बनाम राजनीतिक मंशा?

राज्यपाल द्वारा विभागीय बैठकों की अध्यक्षता और अधिकारियों से सीधे संवाद की घटनाएं हाल के वर्षों में दुर्लभ रही हैं, जिससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह एक नई प्रशासनिक कार्यप्रणाली की शुरुआत है या फिर सिर्फ राजनीतिक तकरार?

सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या इन दौरों के पीछे कोई सत्ता के भीतर असंतोष या प्रशासनिक अस्थिरता छिपी है, या फिर यह एक सोची-समझी रणनीति है विपक्ष को राजनीतिक रूप से असहज करने की?

जहां सरकार इसे एक सामान्य प्रशासनिक कवायद बता रही है, वहीं विपक्ष इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत मान रहा है। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में संवैधानिक पदों की भूमिका और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया प्रदेश की प्रशासनिक दिशा को किस ओर मोड़ती है।

 

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