Raipur News: जब एक जिद ने बदली 1001 लोगों की जिंदगी…राजेश मूणत के जुनून ने लिखी सेवा की अनोखी कहानी

रायपुर। Raipur News: राजनीति को अक्सर सत्ता, चुनाव और संगठन से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन कई बार जनसेवा की भावना राजनीति को एक अलग पहचान देती है। वर्ष 1991-92 में तत्कालीन भाजयुमो जिला अध्यक्ष राजेश मूणत के नेतृत्व में शुरू हुआ 1001 दिव्यांगों को ट्राईसाइकिल उपलब्ध कराने का अभियान ऐसा ही एक उदाहरण बना, जिसे आज भी सेवा और संवेदना की मिसाल के तौर पर याद किया जाता है। स्वतंत्र लेखक और राजनीतिक चिंतक मनोज शुक्ला ने अपने फेसबुक अकाउंट में पोस्ट कर लिखा कि,’मूणत की एक जुनून एक जिद और 1001 लोगों की जिंदगी में उम्मीद’।
कभी-कभी राजनीति सिर्फ सत्ता तक पहुंचने का रास्ता नहीं होती, बल्कि समाज के उन लोगों तक पहुंचने का माध्यम बन जाती है, जिनकी आवाज अक्सर भीड़ में दब जाती है। राजनीति में ऐसे भी लोग हुए हैं, जिन्होंने पद और प्रतिष्ठा से आगे बढ़कर कुछ ऐसा करने की जिद की, जिसकी गूंज वर्षों बाद भी सुनाई देती है।
यह कहानी है तत्कालीन भाजयुमो जिला अध्यक्ष, वर्तमान विधायक एवं पूर्व मंत्री राजेश मूणत के उस जुनून की, जिसने रायपुर में सेवा की राजनीति का एक ऐसा अध्याय लिखा, जिसकी कल्पना उस समय शायद किसी ने नहीं की थी। वह एक अलग दौर था शासकीय योजनाएं कम थी बजट कम होते थे ,जब एक एक ट्राइसयकल के लिए हमने अपंग भाई बहनों को भटकते देखा है लोगों को गांव वालों को घूमते देखा है
साल था 1992
राजेश मूणत 1991 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष बने। पद मिला तो सामान्य राजनीति करना आसान था—बैठकें, भाषण, आंदोलन, नारे और संगठनात्मक कार्यक्रम। लेकिन राजेश मूणत ने भाजयुमो के साथियों के साथ तय किया कि राजनीति के साथ-साथ ऐसा काम भी होना चाहिए, जिसके लिए लोग उन्हें पद से नहीं, सेवा से याद करें। उन्होंने युवा मोर्चा के साथियों के साथ बैठकर विचार किया मैं भी उस अभियान व बैठक का हिस्सा था फिर तत्कालीन संगठन मंत्री गोविंद सारंग जी के सामने एक प्रस्ताव रखा—
1001 दिव्यांग भाई-बहनों को ट्राईसाइकिल देना
वह भी बिना किसी सरकारी सहयोग और बिना चंदा जुटाए। आज के समय में सुनने में यह एक सामाजिक कार्यक्रम भर लग सकता है, लेकिन उस दौर में 1001 ट्राईसाइकिल जुटाना कोई मामूली बात नहीं थी। यह लक्ष्य नहीं, लगभग दुस्साहस था। गोविंद सारंग जी कुछ देर सोचते रहे, भाजपा के जिला इकाई से बात की फिर राजेश मुणत के जुनून को देखकर उन्होंने हरी झंडी दे दी। साथ ही यह भी तय हुआ कि यदि कार्यक्रम की रूपरेखा सफल रही तो देश के तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष और वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी जी को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया जाएगा।इसके बाद जो हुआ, वह किसी अभियान से कम नहीं था।
राजेश मूणत की भाजयुमो की टीम सुबह, शाम, रात—हर समय इसी मिशन में जुट गए। पूरा युवा मोर्चा उनके नेतृत्व में मैदान में उतर गया। उस समय के भाजपा जिला अध्यक्ष जगदीश जैन जी, बृजमोहन अग्रवाल जी गौरीशंकर अग्रवाल जी, सुनील सोनी जी, ओम प्रकाश पुजारी , सुभाष तिवारी जी, देवजी पटेल , रमेश मोदी जी, सहित अनेक नेताओं ने , जैन मित्र मंडल ,विनय मित्र मंडल , गुजराती समाज ,मारवाड़ी समाज सहित सामाजिक संगठनों ने युवा मोर्चा के इस अभियान को खुलकर सहयोग दिया।
लेकिन इस अभियान की सबसे बड़ी खूबी थी—चंदा नहीं लेना।राजेश मूणत ने तय किया कि किसी व्यक्ति से पैसे नहीं मांगे जाएंगे। लोगों से कहा जाएगा कि वे अपने दिवंगत माता-पिता, भाई-बहन या किसी प्रियजन की स्मृति में एक ट्राईसाइकिल दान करें।यही भाव लोगों के दिल को छू गया। शहर के लोगों ने सहयोग किया। शहर से बाहर के लोगों ने सहयोग किया। देखते ही देखते 1001 ट्राईसाइकिल का लक्ष्य पूरा होने लगा।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
लोग लगातार संपर्क करने लगे— “हम भी ट्राईसाइकिल देना चाहते हैं।” अब समस्या उलटी थी। ट्राईसाइकिल देने वाले बहुत थे, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में ट्राईसाइकिल एक साथ आएंगी कहां से? रखेंगे कहा तैयार कैसा होगा । राजेश मूणत फिर जुट गए। वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकर देश के अलग-अलग हिस्सों से ट्राईसाइकिल की व्यवस्था की गई। ट्रकों में भरकर ट्राईसाइकिल रायपुर पहुंचने लगीं। कंपनी के मैकेनिक बुलाए गए। उन्हें तैयार करने में कई कर्मचारी दिन-रात लगे रहे और 8 से 10 दिन तक लगातार काम करना पड़ा। हर ट्राईसाइकिल केवल एक साधन नहीं थी। उसके पीछे उस दानदाता का नाम लिखा गया था, जिसने किसी अपने की स्मृति में वह ट्राईसाइकिल भेंट की थी।
फिर आया वह ऐतिहासिक दिन।
कार्यक्रम के लिए तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी जी से संपर्क किया गया। राजनीति से हटकर युवा मोर्चा द्वारा किए जा रहे इस असाधारण सामाजिक कार्य की जानकारी उन्हें दी गई। आडवाणी जी ने इस प्रयास की सराहना की और रायपुर आने के लिए सहमति दे दी।
मध्यप्रदेश से भाजपा भाजयुमो से सभी वरिष्ठ रायपुर पधारे ,नेताजी सुभाष स्टेडियम रायपुर में ऐतिहासिक कार्यक्रम हुआ। रायपुर संभाग ही नहीं, प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से दिव्यांग भाई-बहनों से संपर्क किया गया। युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने घर-घर पहुंचकर जानकारी जुटाई, फॉर्म भरवाए और लोगों को कार्यक्रम से जोड़ा।
और फिर वह क्षण आया—
एक ही मंच से, एक ही दिन में 1001 से अधिक दिव्यांग भाई-बहनों को ट्राईसाइकिल प्रदान की गईं। उन्हें सम्मान के साथ रायपुर बुलाए गए उनके भोजन की व्यवस्था की गई जो लोग रायपुर में पहले आकर रुकना चाहते थे उन्हें धर्मशाला में कमरा दिलाए गए उनके स्टेडियम तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी ।
लोगों की आंखों में आश्चर्य था। सवाल था—
बिना सरकारी सहायता, बिना चंदा और बिना किसी बड़े संसाधन के युवा मोर्चा ने यह कर कैसे दिखाया?दरअसल, संसाधन कम थे, लेकिन इरादा बड़ा था। यह सिर्फ ट्राईसाइकिल वितरण का कार्यक्रम नहीं था। यह इस बात का प्रमाण था कि युवा राजनीति यदि संवेदनशील हो, तो वह सत्ता की सीढ़ी बनने के बजाय सेवा का रास्ता बन सकती है। उस समय देश के अनेक अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में इस कार्यक्रम को प्रमुखता मिली। पार्टी की बैठकों में इसकी चर्चा हुई। देशभर में उदाहरण दिया गया कि रायपुर के युवा मोर्चा ने समाजसेवा के क्षेत्र में किस तरह एक बड़ा काम करके दिखाया है।
और सबसे बड़ी उपलब्धि?
वे 1001 दिव्यांग भाई-बहन केवल लाभार्थी बनकर नहीं रह गए। उनके परिवारों के साथ एक आत्मीय रिश्ता बना। आम लोगों के बीच युवा मोर्चा की छवि बदली। लोगों को लगा कि राजनीति करने वाले लोग केवल वोट मांगने नहीं, मुश्किल वक्त में हाथ पकड़ने भी आ सकते हैं। मै भी उस समय भाजयुमो के जिला टीम में दूसरी बार पदाधिकारी था ,राजेश मूणत की वह जिद आज भी याद आती है तो एक बात साफ दिखाई देती है।
Raipur News: बड़ी योजनाएं हमेशा बड़े बजट से नहीं बनतीं। कई बार एक आदमी का जुनून, साथियों का विश्वास और समाज का भरोसा मिलकर इतिहास लिख देता है। 1991 में एक युवा नेता ने ठाना था कि राजनीति से हटकर ऐसा काम करना है जिसे लोग याद रखें।उन्होंने कर दिखाया।1001 ट्राईसाइकिलें सिर्फ 1001 लोगों तक नहीं पहुंची थीं। वे 1001 परिवारों तक उम्मीद लेकर पहुंची थीं। कार्यक्रम के बाद भी बहुत सारे लोग लगातार संपर्क करते रहे कि हम ट्राई साइकिल देना चाहते हैं ऐसा विश्वास अर्जित किया था भाजयुमो ने और उस दिन रायपुर में राजनीति ने एक बार फिर साबित किया था। जब राजनीति में संवेदना जिंदा हो, तो एक नेता का जुनून हजारों जिंदगियों में उम्मीद बन सकता है।
नोट – यह आर्टिकल रायपुर के स्वतंत्र लेखक और राजनीतिक चिंतक मनोज शुक्ला की सोशल मीडिया पोस्ट पर आधारित है।




