Fake Journalist Exposed: CJP प्रोटेस्ट के दौरान महज 599 रुपये में बिक रहे थे ‘फर्जी प्रेस ID’ और माइक, पत्रकारिता की पहचान बेचने वाली वेबसाइट्स पर उठे सवाल
यह मामला उस समय चर्चा में आया, जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित CJP Protest 2.0 के दौरान कुछ लोग प्रेस कार्ड और ब्रांडेड माइक्रोफोन के साथ रिपोर्टिंग करते दिखाई दिए। पड़ताल में दावा किया गया कि इनमें से कुछ लोग ऐसी वेबसाइट्स से जुड़ी पहचान का इस्तेमाल कर रहे थे, जो प्रेस आईडी सहित कई सेवाएं देने का प्रचार करती हैं।
599 रुपये से 25 हजार रुपये तक के पैकेज
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, पड़ताल के दौरान कुल छह वेबसाइट्स की जांच की गई। इनमें से चार वेबसाइट्स पर प्रेस आईडी और संबंधित सेवाओं की कीमतें स्पष्ट रूप से दर्ज थीं। कुछ वेबसाइट्स पर शुरुआती पैकेज की कीमत 599 रुपये बताई गई, जबकि अन्य सुविधाओं के लिए अधिक रकम मांगे जाने का दावा किया गया।
इन सेवाओं में प्रेस पहचान-पत्र, रिपोर्टर प्रोफाइल, ऑनलाइन उपस्थिति और माइक्रोफोन जैसी चीजें शामिल बताई गई हैं। द फ्रंटमीडिया फेडरेशन नाम की वेबसाइट पर वाहन पास और अंतरराष्ट्रीय प्रेस कार्ड जैसी सुविधाओं का भी उल्लेख होने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
हालांकि, किसी वेबसाइट पर प्रेस कार्ड या अन्य सेवाओं का उपलब्ध होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसका इस्तेमाल करने वाला हर व्यक्ति फर्जी पत्रकार है। असली सवाल यह है कि संबंधित संगठन आवेदकों की पात्रता की जांच कैसे करते हैं और कार्ड जारी करने के लिए क्या मानक अपनाते हैं।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान सामने आया मामला
CJP Protest 2.0 के दौरान बड़ी संख्या में युवा अपनी मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर जुटे थे। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोग घटनास्थल से वीडियो बनाते और लोगों से सवाल करते नजर आए। रिपोर्ट के अनुसार, एक व्यक्ति के माइक्रोफोन पर इंडियन प्रेस यूनियन का लोगो दिखाई दिया। इसके बाद संगठन की वेबसाइट और उसकी ऑनलाइन गतिविधियों की पड़ताल की गई। रिपोर्ट में दावा किया गया कि वेबसाइट पर प्रेस आईडी और पत्रकारिता से जुड़ी अन्य सेवाओं के लिए भुगतान करने के विकल्प मौजूद थे। पड़ताल में यह भी बताया गया कि इसी तरह की सेवाओं का प्रचार करने वाली कम से कम पांच अन्य वेबसाइट्स सामने आईं। इससे प्रेस पहचान-पत्र जारी करने की प्रक्रिया, उनकी उपयोगिता और उनके संभावित दुरुपयोग को लेकर सवाल उठे।
प्रेस कार्ड होना पत्रकार होने का प्रमाण नहीं
किसी व्यक्ति के पास प्रेस आईडी कार्ड होना और उसका किसी मीडिया संस्थान के लिए अधिकृत पत्रकार होना दो अलग-अलग बातें हैं। प्रेस कार्ड की वैधता और उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस संगठन ने, किन शर्तों के तहत और किस उद्देश्य से जारी किया है।
किसी वेबसाइट से कार्ड खरीद लेने भर से सरकारी मान्यता, पुलिस से विशेष छूट या प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रवेश का अधिकार नहीं मिल जाता। इसी तरह, प्रेस कार्ड होने से किसी व्यक्ति को बिना अनुमति किसी की निजी जानकारी जुटाने या किसी पर आरोप लगाने की छूट भी नहीं मिलती। यदि कोई व्यक्ति पत्रकार होने की पहचान का गलत इस्तेमाल करता है, तो इससे आम नागरिकों की निजता, प्रतिष्ठा और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इसलिए प्रेस कार्ड जारी करने वाले संगठनों की पारदर्शिता और उनकी जवाबदेही महत्वपूर्ण है।
AI तस्वीरों और संगठन की पहचान को लेकर भी सवाल
रिपोर्ट में इंडियन प्रेस यूनियन की वेबसाइट पर प्रदर्शित कुछ तस्वीरों का भी उल्लेख किया गया है। इंडिया टुडे के मुताबिक, इंटरव्यू, प्रेस कॉन्फ्रेंस और अन्य कार्यक्रमों की कुछ तस्वीरें कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI से बनाई गई प्रतीत होती थीं।
ऐसी तस्वीरों का इस्तेमाल किसी संगठन की गतिविधियों और उसकी विश्वसनीयता की छवि प्रस्तुत करने के लिए किया जा सकता है। हालांकि, किसी तस्वीर के AI से निर्मित होने का संदेह अपने आप में संगठन की धोखाधड़ी का प्रमाण नहीं है। इसके लिए तस्वीरों के स्रोत और संबंधित दावों की स्वतंत्र जांच जरूरी है।
रिपोर्ट में एक व्यक्ति के हवाले से यह भी बताया गया कि उसने 1,799 रुपये खर्च करके प्रेस पहचान-पत्र प्राप्त किया था। इस तरह के उदाहरणों से यह सवाल उठता है कि पहचान-पत्र जारी करने से पहले आवेदक के वास्तविक पत्रकारिता कार्य की कितनी जांच की जाती है।
सोशल मीडिया पर लाखों व्यूज, लेकिन जवाबदेही कौन तय करेगा?
आज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वीडियो और रिपोर्ट कुछ ही समय में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकते हैं। इंडिया टुडे की पड़ताल में ऐसे कई वीडियो मिलने की बात कही गई है, जिनमें इंडियन प्रेस यूनियन से जुड़े लोग CJP Protest 2.0 के दौरान रिपोर्टिंग करते नजर आए। इनमें से कई वीडियो निजी इंस्टाग्राम और यूट्यूब अकाउंट पर साझा किए गए थे और रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें लाखों व्यूज मिले।
यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दर्शक किसी सामग्री को पत्रकारिता के रूप में देखते हैं, तो वे उससे तथ्यात्मक जानकारी, निष्पक्षता और जिम्मेदारी की अपेक्षा करते हैं। यदि रिपोर्टिंग करने वाले व्यक्ति की पहचान, जानकारी के स्रोत और तथ्यों की पुष्टि करने की प्रक्रिया स्पष्ट न हो, तो गलत या भ्रामक दावों के फैलने का जोखिम बढ़ सकता है।
हालांकि, सोशल मीडिया पर रिपोर्टिंग करना या निजी डिजिटल चैनल चलाना अपने आप में गलत नहीं है। स्वतंत्र पत्रकार भी महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने लाते हैं। अंतर इस बात से पड़ता है कि वे तथ्यों की पुष्टि कैसे करते हैं, संबंधित पक्षों का जवाब लेते हैं और अपनी सामग्री के लिए कितने जवाबदेह हैं।
कब शुरू हुईं ये वेबसाइट्स?
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, जांच में शामिल कम से कम तीन वेबसाइट्स फरवरी और मार्च 2026 के बीच बनाई गई थीं। रिपोर्ट में NEED24 की शुरुआत 2022, फ्रंटमीडिया फेडरेशन की 2024 और इंडियन प्रेस यूनियन की 2025 में स्थापना या ऑनलाइन मौजूदगी का उल्लेख किया गया है। वहीं, इंडियन प्रेस यूनियन की वेबसाइट पर 2016 से काम करने का दावा होने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। इंडिया टुडे के मुताबिक, उसकी पड़ताल में इस दावे की पुष्टि करने वाले पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले।
Viral Video: आर्केस्ट्रा में अश्लील डांस करते नजर आए BJP के ये नेता, पैसे उड़ाते वीडियो वायरल
यहां ध्यान देना जरूरी है कि किसी वेबसाइट का नया होना या किसी संगठन का हाल में शुरू होना अपने आप में किसी गड़बड़ी का सबूत नहीं है। इसी तरह, किसी संगठन द्वारा प्रेस कार्ड जारी करने मात्र से उसके सभी कार्डधारकों को फर्जी पत्रकार नहीं कहा जा सकता। इसके लिए संगठन की कार्यप्रणाली, सदस्यता के नियम और संबंधित व्यक्तियों के वास्तविक काम की जांच आवश्यक है।
स्वतंत्र पत्रकारिता और फर्जी पहचान में क्या है अंतर?
Fake Journalist Exposed: पत्रकारिता करने के लिए किसी बड़े समाचार संस्थान का हिस्सा होना हमेशा जरूरी नहीं है। स्वतंत्र पत्रकार, स्थानीय रिपोर्टर और छोटे डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म भी जनहित के मुद्दों को प्रभावी तरीके से सामने ला सकते हैं। लेकिन पत्रकार होने का दावा करने और जिम्मेदार पत्रकारिता करने के बीच स्पष्ट अंतर है। विश्वसनीय रिपोर्टिंग के लिए तथ्यों की पुष्टि, संबंधित पक्षों का नजरिया, निष्पक्षता, पारदर्शिता और प्रकाशित सामग्री के प्रति जवाबदेही जरूरी होती है।




