Supreme Court: सिर्फ गाली-गलौज देना अश्लीलता नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने धारा 294 का दायरा किया स्पष्ट, अपशब्द बोलना हर बार अपराध नहीं
नई दिल्ली। Supreme Court: अक्सर आपने देखा होगा की लोग बातचीत के दौरान या मामूली विवाद में गाली-गलौज का उपयोग करने लगते हैं। लेकिन इसे लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल गाली-गलौज, अपमानजनक या अभद्र भाषा का प्रयोग अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294 के तहत ‘अश्लीलता’ की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने कहा कि कानून की नजर में अश्लीलता और अभद्र भाषा दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं, इसलिए दोनों को एक समान नहीं माना जा सकता। जस्टिस संजय करोल और विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी तमिलनाडु के एक 70 वर्षीय व्यक्ति की अपील पर सुनवाई करते हुए की। मामला वर्ष 2017 में जमीन विवाद के दौरान हुए झगड़े से जुड़ा था।
क्या था मामला?
अभियोजन के अनुसार, जमीन को लेकर हुए विवाद में आरोपी ने शिकायतकर्ता के साथ कथित रूप से गाली-गलौज की, जान से मारने की धमकी दी और धारदार हथियार से हमला किया, जिससे शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी टूट गई। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को IPC की विभिन्न धाराओं और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दोषी ठहराया था। बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने उसे एससी/एसटी एक्ट के आरोपों से बरी कर दिया। साथ ही IPC की धारा 294 (सार्वजनिक स्थान पर अश्लील शब्दों का प्रयोग) और धारा 506(II) (आपराधिक धमकी) के आरोप भी हटाए, जबकि धारा 326 (खतरनाक हथियार से गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी। आरोपी की उम्र, स्वास्थ्य और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने उसकी सजा को ‘अदालत उठने तक की कैद’ में बदल दिया और 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।
धारा 294 कब होगी लागू?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि धारा 294 लागू करने के लिए केवल अपशब्दों का इस्तेमाल पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह साबित करना होगा कि—
- इस्तेमाल किए गए शब्द अश्लील प्रकृति के थे और उनमें यौन या कामुक तत्व मौजूद था।
- उन शब्दों में लोगों की नैतिकता को प्रभावित या भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति थी।
- कथित शब्द सार्वजनिक स्थान या उसके आसपास बोले गए।
- वहां मौजूद अन्य लोगों को उससे वास्तविक असुविधा या परेशानी हुई।
अदालत ने कहा कि, केवल किसी व्यक्ति की भावनाएं आहत होना या भाषा का अशिष्ट होना धारा 294 के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।
धमकी को लेकर भी अदालत की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि, किसी विवाद या बहस के दौरान गुस्से में कही गई हर धमकी स्वतः आपराधिक धमकी नहीं बन जाती। IPC की धारा 506(II) तभी लागू होगी जब यह साबित हो कि आरोपी का उद्देश्य सामने वाले व्यक्ति में भय उत्पन्न करना या उसे किसी कार्य के लिए मजबूर करना था।
गंभीर चोट के मामले में दोषसिद्धि बरकरार
हालांकि अदालत ने माना कि, आरोपी द्वारा धारदार हथियार से हमला किए जाने के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद है। मेडिकल रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं, इसलिए IPC की धारा 326 के तहत दोषसिद्धि को सही ठहराया गया।
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महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी
Supreme Court: अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि अभद्र भाषा, अपमानजनक शब्द और अश्लीलता समान नहीं हैं। अदालत ने कहा कि किसी शब्द या अभिव्यक्ति को अश्लील माना जाएगा या नहीं, इसका आकलन उसके यौन प्रभाव, प्रकृति और समकालीन सामाजिक मानकों के आधार पर किया जाएगा।




