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विदेशी मेहमानों ने किया पिंडदान, देवघाट पर गूंजे वेद मंत्र

रूस, यूक्रेन, स्पेन समेत कई देशों से आए विदेशी श्रद्धालुओं ने पूर्वजों की शांति और मोक्ष के लिए देवघाट पर कराया पिंडदान

गयाजी : बिहार के गया में पितृपक्ष का मेला इन दिनों पूरे रंग पर है। पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना करने देश-विदेश से हजारों लोग यहां जुट रहे हैं। इस बार कुछ खास नजारा देवघाट पर देखने को मिला, जब अलग-अलग देशों से आए विदेशी महिला-पुरुष श्रद्धालुओं ने पूरे विधि-विधान के साथ पिंडदान कर पूर्वजों को तर्पण दिया।

करीब 17 विदेशी मेहमान, जिनमें रूस, यूक्रेन, स्पेन और अफ्रीकी देशों से आए लोग भी शामिल थे, पहली बार गयाजी पहुंचे। सफेद धोती और साड़ी में सजे इन श्रद्धालुओं ने स्थानीय पंडा-पुजारियों की मदद से पूरा अनुष्ठान किया। पंडितों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पिंडदान की प्रक्रिया कराई, जिसके बाद विदेशी मेहमान भी आध्यात्मिक माहौल में खुद को संपूर्ण रूप से जुड़ा हुआ महसूस कर रहे थे।

विदेशी मेहमानों का अनुभव
एक महिला श्रद्धालु, जो रूस से आई थीं, भावुक होते हुए बोलीं – “आज का दिन मेरे लिए बेहद खास है। हमने सुना था कि गयाजी में पिंडदान करने से आत्माओं को मोक्ष मिलता है। जब यहां आकर यह परंपरा निभाई तो एक अनोखी शांति का एहसास हुआ। यहां के लोग बहुत अतिथि-निवासी हैं, हमें अपनेपन का एहसास दिलाया।”

वहीं एक अन्य श्रद्धालु, जो उत्तर प्रदेश के बीएचयू से संस्कृत की पढ़ाई कर रहे हैं, उन्होंने अपने विदेशी दोस्तों को भी इस परंपरा से जुड़े रहने की प्रेरणा दी। उन्हीं की बातों से प्रभावित होकर रूस, यूक्रेन और स्पेन से इन 17 लोगों ने यहां आकर पिंडदान करने का निर्णय लिया।

स्थानीय पंडा की प्रतिक्रिया

गया के पुरोहितों का कहना है कि हर साल पितृपक्ष में विदेशी पर्यटकों और श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। पंडित त्रिलोकीनाथ ने बताया, “इस बार रूस, यूक्रेन, जर्मनी, नाइजीरिया, घाना और साउथ अफ्रीका से श्रद्धालु यहां पहुंचे हैं। यह देखकर खुशी होती है कि हमारी सनातन परंपरा आज पूरी दुनिया में फैल रही है। विदेशों से लोग यहां इसलिए आते हैं क्योंकि उन्हें भरोसा है कि गयाजी में पिंडदान से पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है।”

परंपरा की वैश्विक गूंज
गया के देवघाट पर विदेशी महिलाएं खासतौर पर भारतीय परिधान साड़ी पहनकर अनुष्ठान करती दिखीं। पुरुष श्रद्धालु पारंपरिक धोती पहने नजर आए। इनकी आस्था देखकर स्थानीय लोग भी हैरान थे कि हजारों किलोमीटर दूर से आने के बावजूद ये विदेशी उसी श्रद्धा और नियम से परंपरा निभा रहे हैं, जैसे भारत के लोग निभाते हैं।

बीते वर्षों में भी यह परंपरा कई बार चर्चा में रही है। 2023 में जर्मनी से आए 12 श्रद्धालु महिलाओं ने पवित्र फल्गु नदी के तट पर पिंडदान किया था। वहीं 2024 में रूस और यूक्रेन के कई लोग अपने परिजनों और युद्ध में मारे गए सैनिकों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करने पहुंचे थे।

क्यों खिंचते हैं विदेशी गयाजी की ओर?
विदेशी श्रद्धालु बताते हैं कि सनातन धर्म उन्हें तार्किक और वैज्ञानिक लगता है। पूर्वजों को याद करने की यह परंपरा उन्हें गहरे स्तर पर जोड़ती है। कई लोग कहते हैं कि यहां आकर मानसिक शांति की अनुभूति होती है। शायद यही वजह है कि लगातार बढ़ती संख्या में विदेशी गयाजी का रुख कर रहे हैं।

गया का पितृपक्ष सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि एक विश्वस्तर का आध्यात्मिक संगम बन चुका है। देवघाट पर गूंजते मंत्र और आस्था से जुड़ते विदेशी मेहमान इस बात की गवाही हैं कि सनातन संस्कृति अब सीमाओं से परे जाकर पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित कर रही है।

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